This Self cannot be cut, burned, wetted, nor dried up; it is eternal, all-pervasive, stable, immovable, and ancient.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।2.24।। क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य (काटी नहीं जा सकती), अदाह्य (जलाई नहीं जा सकती), अक्लेद्य (गीली नहीं हो सकती ) और अशोष्य (सुखाई नहीं जा सकती) है; यह नित्य, सर्वगत, स्थाणु (स्थिर), अचल और सनातन है।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
It is impenetrable; it cannot be drowned, scorched, or dried. It is eternal, all-pervasive, unchanging, immovable, and most ancient.
Shri Purohit Swami
This cannot be cut; this cannot be burnt; this cannot be made wet nor dried; this is eternal, all-pervading, stable, immovable, and everlasting.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
The Self is very subtle. It is beyond the reach of speech and mind. It is very difficult to understand this subtle Self. So Lord Krishna explains the nature of the immortal Self in a variety of ways with various illustrations and examples, so that It can be grasped by the people.Sword cannot cut this Self. It is eternal. Because It is eternal, It is allpervading. Because It is allpervading, It is stable like a stature. Because It is stable, It is immovable. It is everlasting. Therefore, It is not produced out of any cause. It is not new. It is ancient.
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।2.24।। यह तो स्पष्ट ही है कि जिस वस्तु का नाश प्रकृति की विनाशकारी शक्तियाँ अथवा मानव निर्मित साधनों एवं शस्त्रास्त्रों के द्वारा संभव नहीं है उसे नित्य होना चाहिये।इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में आत्मा के अनेक विशेषण बताये गये हैं जो शीघ्रतावश चाहें जहां से उठाकर निष्प्रयोजन ही प्रयोग में नहीं लाये गये हैं। विचारों की एक शृंखला के रूप में प्रत्येक शब्द को चुनकर प्रयोग किया गया है। प्रथम पंक्ति में वर्णित जो अविनाशी तत्व हैं उसको नित्य होना चाहिये। जो नित्य वस्तु है वह निश्चित ही सर्वगत भी होगी।सर्वगत इस छोटे से शब्द का अर्थ व्यापक और तात्पर्य गम्भीर है। कोई भी वस्तु ऐसी शेष नहीं रह सकती जो सर्वगत तत्त्व के द्वारा व्याप्त न हो। नित्य आत्मा सर्वगत है तो उसका कोई आकार विशेष भी नहीं हो सकता क्योंकि आकार केवल परिच्छिन्न वस्तु का होता है जिसकी सीमा के बाहर उससे भिन्न अन्य कोई वस्तु रहती है। जैसे हाथ पैर इत्यादि अवयवों का आकार होता है क्योंकि इनके बाहर आसपास आकाश तत्त्व है। अत अपरिच्छिन्न सर्वगत आत्मा का कोई आकार नहीं है क्योंकि उसको परिच्छिन्न करने वाली कोई अन्य वस्तु है ही नहीं।इस प्रकार नित्य सर्वगत वस्तु का स्थिर और अचल होना स्वाभाविक है। उसमें चलनादि क्रिया संभव नहीं। गति केवल उस वस्तु के लिये है जो किसी काल और देश विशेष में रहती हो तब उसका स्थानान्तरण किया जा सकता है। आत्मा का किसी काल अथवा देश में अभाव नहीं है तो उसमें गति होने का प्रश्न ही नहीं उठता। मैं अपने स्वयं में ही घूम फिर नहीं सकता।यहाँ स्थिर और अचल दोनों शब्दों का एक साथ प्रयोग व्यर्थ प्रतीत हो रहा है क्योंकि वे कुछ समानार्थी हैं। परन्तु स्थिर शब्द से अभिप्राय नीचे मूल की स्थिरता से है जैसे पेड़ एक जगह स्थिर होते हैं परन्तु उनकी वृद्धि ऊपर की ओर होती है। यहाँ अचल रहकर ऊर्ध्व गति का भी निषेध किया गया है। अनन्तस्वरूप आत्मा स्थिर और अचल है अर्थात् उसमें किसी भी प्रकार की चलन क्रिया नहीं है।प्राचीन पुरातन वस्तु को सनातन कहते हैं। इस सनातन शब्द के दो अर्थ हैं एक वाच्यार्थ (शाब्दिक) और दूसरा है लक्ष्यार्थ। उसका सरल वाच्यार्थ यह है कि आत्मा कोई नई बनी वस्तु नहीं है वह प्राचीन है। लक्ष्यार्थ के अनुसार इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा काल और देश से मर्यादित परिच्छिन्न नहीं है। किसी भी देश में किसी भी काल में कोई भी व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार से पूर्णत्व प्राप्त करता है तो वह साक्षात्कार एक ही होगा भिन्नभिन्न नहीं।आगे भगवान कहते हैं
Swami Chinmayananda
।।2.24।। व्याख्या-- [शस्त्र आदि इस शरीरीमें विकार क्यों नहीं करते यह बात इस श्लोकमें कहते हैं।]
'अच्छेद्योऽयम्'-- शस्त्र इस शरीरीका छेदन नहीं कर सकते। इसका मतलब यह नहीं है कि शस्त्रोंका अभाव है या शस्त्र चलानेवाला अयोग्य है प्रत्युत छेदनरूपी क्रिया शरीरीमें प्रविष्ट ही नहीं हो सकती यह छेदन होनेके योग्य ही नहीं है।
शस्त्रके सिवाय मन्त्र शाप आदिसे भी इस शरीरीका छेदन नहीं हो सकता। जैसे याज्ञवल्क्यके प्रश्नका उत्तर न दे सकनेके कारण उनके शापसे शाकल्यका मस्तक कटकर गिर गया (बृहदारण्यक0)। इस प्रकार देह तो मन्त्रोंसे वाणीसे कट सकता है पर देही सर्वथा अछेद्य है।
'अदाह्योऽयम्'-- यह शरीरी अदाह्य है क्योंकि इसमें जलनेकी योग्यता ही नहीं है। अग्निके सिवाय मन्त्र शाप आदिसे भी यह देही जल नहीं सकता। जैसे दमयन्तीके शाप देनेसे व्याध बिना अग्निके जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार अग्नि शाप आदिसे वही जल सकता है जो जलनेयोग्य होता है। इस देहीमें तो दहनक्रियाका प्रवेश ही नहीं हो सकता।
'अक्लेद्यः'-- यह देही गीला होनेयोग्य नहीं है अर्थात् इसमें गीला होनेकी योग्यता ही नहीं है। जलसे एवं मन्त्र शाप ओषधि आदिसे यह गीला नहीं हो सकता। जैसे सुननेमें आता है कि मालकोश रागके गाये जानेसे पत्थर भी गीला हो जाता है चन्द्रमाको देखनेसे चन्द्रकान्तमणि गीली हो जाती है। परन्तु यह देही रागरागिनी आदिसे गीली होनेवाली वस्तु नहीं है।
'अशोष्यः'-- यह देही अशोष्य है। वायुसे इसका शोषण हो जाय यह ऐसी वस्तु नहीं है क्योंकि इसमें शोषणक्रियाका प्रवेश ही नहीं होता। वायुसे तथा मन्त्र शाप ओषधि आदिसे यह देही सूख नहीं सकता। जैसे अगस्त्य ऋषि समुद्रका शोषण कर गये ऐसे इस देहीका कोई अपनी शक्तिसे शोषण नहीं कर सकता।
'एव च'-- अर्जुन नाशकी सम्भावनाको लेकर शोक कर रहे थे। इसलिये शरीरीको अच्छेद्य अदाह्य अक्लेद्य और अशोष्य कहकर भगवान् 'एव च' पदोंसे विशेष जोर देकर कहते हैं कि यह शरीरी तो ऐसा ही है। इसमें किसी भी क्रियाका प्रवेश नहीं होता। अतः यह शरीरी शोक करनेयोग्य है ही नहीं।
'नित्यः'-- यह देही नित्यनिरन्तर रहनेवाला है। यह किसी कालमें नहीं था और किसी कालमें नहीं रहेगा ऐसी बात नहीं है किन्तु यह सब कालमें नित्यनिरन्तर ज्योंकात्यों रहनेवाला है।
'सर्वगतः'-- यह देही सब कालमें ज्योंकात्यों ही रहता है तो यह किसी देशमें रहता होगा इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही सम्पूर्ण व्यक्ति वस्तु शरीर आदिमें एकरूपसे विराजमान है।
'अचलः'-- यह सर्वगत है तो यह कहीं आताजाता भी होगा इसपर कहते हैं कि यह देही स्थिर स्वभाववाला है अर्थात् इसमें कभी यहाँ और कभी वहाँ इस प्रकार आनेजानेकी क्रिया नहीं है।
'स्थाणुः'-- यह स्थिर स्वभाववाला है कहीं आताजाता नहीं यह बात ठीक है पर इसमें कम्पन तो होता होगा
जैसे वृक्ष एक जगह ही रहता है कहीं भी आताजाता नहीं पर वह एक जगह रहता हुआ ही हिलता है ऐसे ही इस देहीमें भी हिलनेकी क्रिया होती होगी इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही स्थाणु है अर्थात् इसमें हिलनेकी क्रिया नहीं है।
'सनातनः'-- यह देही अचल है स्थाणु है यह बात तो ठीक है पर यह कभी पैदा भी होता होगा इसपर कहते हैं कि यह सनातन है अनादि है सदासे है। यह किसी समय नहीं था ऐसा सम्भव ही नहीं है।
'विशेष बात'
यह संसार अनित्य है एक क्षण भी स्थिर रहनेवाला नहीं है। परन्तु जो सदा रहनेवाला है जिसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता उस देहीकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'नित्यः'पदका तात्पर्य है।
देखने सुनने पढ़ने समझनेमें जो कुछ प्राकृत संसार आता है उसमें जो सब जगह परिपूर्ण तत्त्व है उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'सर्वगतः' पदका तात्पर्य है।
संसारमात्रमें जो कुछ वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदि हैं वे सबकेसब चलायमान हैं। उन चलायमान वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदिमें जो अपने स्वरूपसे कभी चलायमान (विचलित) नहीं होता उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'अचलः' पदका तात्पर्य है।
प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें प्रतिक्षण क्रिया होती रहती है परिवर्तन होता रहता है। ऐसे परिवर्तनशील संसारमें जो क्रियारहित परिवर्तनरहित स्थायी स्वभाववाला तत्त्व है उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'स्थाणुः' पदका तात्पर्य है।
मात्र प्राकृत पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा ये पहले भी नहीं थे और पीछे भी नहीं रहेंगे। परन्तु जो न उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है तथा जो पहले भी था और पीछे भी हरदम रहेगा उस तत्त्व(देही)की तरफ लक्ष्य करानेमें 'सनातनः' पदका तात्पर्य है।
उपर्युक्त पाँचों विशेषणोंका तात्पर्य है कि शरीरसंसारके साथ तादात्म्य होनेपर भी और शरीरशरीरीभावका अलगअलग अनुभव न होनेपर भी शरीरी नित्यनिरन्तर एकरस एकरूप रहता है।
Swami Ramsukhdas
Key teachings
It is beyond the reach of speech and mind.
It is very difficult to understand this subtle Self.
So Lord Krishna explains the nature of the immortal Self in a variety of ways with various illustrations and examples, so that It can be grasped by the people.Sword cannot cut this Self.
Spiritual significance
In Sankhya Yoga (Transcendental Knowledge), this verse belongs to the Gita’s teaching on karma yoga. Here the text presents that teaching through these words: This Self cannot be cut, burned, wetted, nor dried up; it is eternal, all-pervasive, stable, immovable, and ancient.
Chapter 2, verse 24 is part of Sankhya Yoga. In the English translation used on this page, it says: This Self cannot be cut, burned, wetted, nor dried up; it is eternal, all-pervasive, stable, immovable, and ancient.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Sankhya Yoga, a chapter associated with Karma Yoga. The immortal self.