prakṛitim—the material energy; svām—my own; avaṣhṭabhya—presiding over; visṛijāmi—generate; punaḥ punaḥ—again and again; bhūta-grāmam—myriad forms; imam—these; kṛitsnam—all; avaśham—beyond their control; prakṛiteḥ—nature; vaśhāt—force
English translation
Animating My Nature, I again and again send forth all this multitude of beings, helpless under the force of Nature.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।9.8।। प्रकृति को अपने वश में करके (अर्थात् उसे चेतनता प्रदान कर) स्वभाव के वश से परतन्त्र (अवश) हुए इस सम्पूर्ण भूत समुदाय को मैं पुन:-पुन: रचता हूँ।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
With the help of Nature, I again and again pour forth the whole multitude of beings, whether they will or not, for they are ruled by My will.
Shri Purohit Swami
Taking hold of My own nature, I again and again send forth this entire host of beings, which is powerless under the control of My nature.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
The Lord leans on, presses or embraces Nature. He invigorates and fertilises Nature which had gone to sleep at the end of the Mahakalpa or universal dissolution and projects again and again this whole multitude of beings. He gazes at each level and plane after plane comes into being.The term Prakriti denotes or indicates the five Kleshas or afflictions, viz., Avidya (ignorance), Asmita (egoism), Raga (likes), Dvesha (dislikes) and Abhinivesa (clinging to earthly life). (Cf.IV.6)
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।9.8।। समष्टि सूक्ष्म शरीर (मनबुद्धि) में व्यक्त हो रहे चैतन्य ब्रह्म को ईश्वर सृष्टिकर्ता कहते हैं एक व्यष्टि सूक्ष्म शरीर को उपाधि से विशिष्ट वही ब्रह्म? संसारी जीव कहलाता है। एक ही सूर्य विशाल? स्वच्छ और शान्त सरोवर में तथा मटमैले जल से भरे कुण्ड में भी प्रतिबिम्बित होता है। तथापि दोनों के प्रतिबिम्बों में जो अन्तर होता है उसका कारण दोनों जलांे का अन्तर है। यह उदाहरण जीव और ईश्वर के भेद को स्पष्ट करता है। जिस प्रकार आकाश में स्थित सूर्य का यह कथन उपयुक्त होगा कि सरोवर के निश्चल और तेजस्वी प्रतिबिम्ब तथा जलकुण्ड के चंचल और मन्द प्रतिबिम्ब का कारण मैं हूँ? उसी प्रकार ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि सृष्टिकर्ता और सृष्टप्रणियों की चेतन आत्मा मैं हूँ।समष्टि सूक्ष्म शरीर रूपी उपाधि ब्रह्म की अपरा प्रकृति है। कल्प के आदि में? अपरा प्रकृति में विद्यमान वासनायें व्यक्त होती हैं और? कल्प की समाप्ति पर सब भूत मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं।प्रकृति को चेतना प्रदान करने की क्रिया ब्रह्म की कृपा है? जिससे प्रकृति वृद्धि को प्राप्त होकर संसार वृक्ष का रूप धारण करती है। यदि परम चैतन्यस्वरूप ब्रह्म प्रकृति (माया) से तादात्म्य न करे अथवा उसमें व्यक्त न हो? तो वह प्रकृति स्वयं जड़ होने के कारण? किसी भी जीव की सृष्टि नहीं कर सकती। वासनारूपी इस सम्पूर्ण भूतसमुदाय को? मैं पुनपुन रचता हूँ। आत्मा की चेतनता प्राप्त होने के पश्चात् भूतमात्र व्यक्त हुए बिना नहीं रह सकते? क्योंकि वे प्रकृति के वश में हैं? स्वतन्त्र नहीं।प्राय वेदान्त दर्शन में? ऋषिगण विश्व की उत्पत्ति का वर्णन समष्टि के दृष्टिकोण से करते हैं? जिसके कारण वेदान्त के प्रारम्भिक विद्यार्थियों को कुछ कठिनाई होती है। परन्तु जो विद्यार्थी? उसके आशय को व्यक्तिगत (व्यष्टि) दृष्टि से समझने का प्रयत्न करता है? वह इस सृष्टि की रचना को सरलता से समझ सकता है। इस प्रकार व्यष्टि का दृष्टि से विचार करने पर भगवान् श्रीकृष्ण का कथन सत्य प्रमाणित होगा। अपरा प्रकृति के अंश रूप मन और बुद्धि से आत्मचैतन्य का तादात्म्य हुए बिना हममें एक विशिष्ट गुणधर्मी जीव की उत्पत्ति नहीं हो सकती? जो अपने संसारी जीवन के दुखों को भोगता रहता है।हम पहले भी देख चुके हैं कि निद्रावस्था में मनबुद्धि के साथ तादात्म्य अभाव में एक अत्यन्त दुष्ट पुरुष और एक महात्मा पुरुष दोनों एक समान होते हैं। परन्तु जाग्रत अवस्था में दोनों अपनेअपने स्वभाव को व्यक्त करते हैं? जबकि दोनों में वही एक आत्मचैतन्य व्यक्त होता है। दुष्ट मनुष्य साधु के समान क्षणमात्र भी व्यवहार नहीं कर सकता और न वह साधु ही उस दुष्ट के समान व्यवहार करेगा? क्योंकि दोनों ही अपनी प्रकृति के वशात् अन्यथा व्यवहार करने में असमर्थ हैं। भूत समुदाय की सृष्टि और प्रलय का यह सम्पूर्ण नाटक अपरिवर्तनशील? अक्षर नित्य आत्मतत्त्व के रंगमंच पर खेला जाता है मैं पुनपुन उसको रचता हूँ।कर्म का सिद्धांत विवादातीत है। जैसा कर्म वैसा फल। यदि आत्मा भूतमात्र की सृष्टि और प्रलय के कर्म का कर्ता हो? तो क्या उसे भी धर्मअधर्म रूप बन्धन होता है इस पर भगवान् कहते हैं --
Swami Chinmayananda
।।9.8।। व्याख्या--'भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्'-- यहाँ प्रकृति शब्द व्यष्टि प्रकृतिका वाचक है। महाप्रलयके समय सभी प्राणी अपनी व्यष्टि प्रकृति-(कारणशरीर) में लीन हो जाते हैं, व्यष्टि प्रकृति समष्टि प्रकृतिमें लीन होती है और समष्टि प्रकृति परमात्मामें लीन हो जाती है। परन्तु जब महासर्गका समय आता है, तब जीवोंके कर्मफल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं। उस उन्मुखताके कारण भगवान्में 'बहु स्यां प्रजायेय' (छान्दोग्य0 6। 2। 3) -- यह संकल्प होता है, जिससे समष्टि प्रकृतिमें क्षोभ (हलचल) पैदा हो जाता है। जैसे, दहीको बिलोया जाय तो उसमें मक्खन और छाछ --ये दो चीजें पैदा हो जाती हैं। मक्खन तो ऊपर आ जाता है और छाछ नीचे रह जाती है। यहाँ मक्खन सात्त्विक है, छाछ तामस है और बिलोनारूप क्रिया राजस है। ऐसे ही भगवान्के संकल्पसे प्रकृतिमें क्षोभ हुआ तो प्रकृतिसे सात्त्विक, राजस और तामस --ये तीनों गुण पैदा हो गये। उन तीनों गुणोंसे स्वर्ग, मृत्यु और पाताल --ये तीनों लोक पैदा हुए। उन तीनों लोकोंमें भी अपने-अपने गुण, कर्म और स्वभावसे सात्त्विक, राजस और तामस जीव पैदा हुए अर्थात् कोई सत्त्व-प्रधान हैं, कोई रजःप्रधान हैं और कोई तमःप्रधान हैं।इसी महासर्गका वर्णन चौदहवें अध्यायके तीसरे-चौथे श्लोकोंमें भी किया गया है। वहाँ परमात्माकी प्रकृतिको 'महद्ब्रह्म' कहा गया है और परमात्माके अंश जीवोंका अपने-अपने गुण, कर्म और स्वभावके अनुसार प्रकृतिके साथ विशेष सम्बन्ध करा देनेको बीज-स्थापन करना कहा गया है।
Swami Ramsukhdas
Key teachings
The Lord leans on, presses or embraces Nature.
He invigorates and fertilises Nature which had gone to sleep at the end of the Mahakalpa or universal dissolution and projects again and again this whole multitude of beings.
He gazes at each level and plane after plane comes into being.The term Prakriti denotes or indicates the five Kleshas or afflictions, viz., Avidya (ignorance), Asmita (egoism), Raga (likes), Dvesha (dislikes) and Abhinivesa (clinging to earthly life).
Spiritual significance
In Raja Vidya Yoga (Yoga through the King of Sciences), this verse belongs to the Gita’s teaching on bhakti yoga. Here the text presents that teaching through these words: Animating My Nature, I again and again send forth all this multitude of beings, helpless under the force of Nature.
Chapter 9, verse 8 is part of Raja Vidya Yoga. In the English translation used on this page, it says: Animating My Nature, I again and again send forth all this multitude of beings, helpless under the force of Nature.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Raja Vidya Yoga, a chapter associated with Bhakti Yoga. God pervading all beings.