But verily, there exists higher than this Unmanifested, another Unmanifested Eternal, which is not destroyed even when all beings are destroyed.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।8.20।। परन्तु उस अव्यक्त से परे अन्य जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह समस्त भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
In truth, therefore, there is the eternal, unmanifest, which is beyond and above the unmanifest spirit of creation, and which is never destroyed when all these beings perish.
Shri Purohit Swami
But there exists another Being which is beyond this, and It is both manifest and unmanifest and is eternal. It is this Being that does not perish while all other beings perish.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
Another unmanifested in the ancient or eternal Para Brahman Who is distinct from the Unmanifested (Avyakta or Primordial Nature), Who is of ite a different nature. It is superior to Hiranyagarbha (the Cosmic Creative Intelligence) and the Unmanifested Nature because It is their cause. It is not destroyed when all the beings from Brahma down to the ants or the blade of grass are destroyed. (Cf.XV.17)
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।8.20।। विद्यालय की कक्षा में एक श्यामपट लगा होता है जिसका उपयोग एक ही दिन में अनेक अध्यापक विभिन्न विषयों को समझाने के लिए करते हैं। प्रत्येक अध्यापक अपने पूर्व के अध्यापक द्वारा श्यामपट पर लिखे अक्षरों को मिटाकर अपना विषय समझाता है। इस प्रकार गणित का अध्यापक अंकगणित या रेखागणित की आकृतियाँ खींचता है तो भूगोल पढ़ाने वाले अध्यापक नक्शों को जिनमें नदी पर्वत आदि का ज्ञान कराया जाता है। रासायन शास्त्र के शिक्षक रासायनिक क्रियाएँ एवं सूत्र समझाते हैं और इतिहास के शिक्षक पूर्वजों की वंश परम्पराओं का ज्ञान कराते हैं। प्रत्येक अध्यापक विभिन्न प्रकार के अंक आकृति चिह्न आदि के द्वारा अपने ज्ञान को व्यक्त करता है। यद्यप्ा सबके विषय आकृतियाँ भिन्नभिन्न थीं परन्तु उन सबके लिए उपयोग किया गया श्यामपट एक ही था।इसी प्रकार इस परिवर्तनशील जगत् के लिए भी जो कि अव्यक्त का व्यक्त रूप है एक अपरिवर्तनशील अधिष्ठान की आवश्यकता है जो सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता। जब संध्याकाल में सब विद्यार्थी और शिक्षक अपने घर चले जाते हैं तब भी वह श्यामपट अपने स्थान पर ही स्थित रहता है। यह चैतन्य तत्त्व जो स्वयं इन्द्रिय मन और बुद्धि के द्वारा अग्राह्य होने के कारण अव्यक्त कहलाता है इस जगत् का अधिष्ठान है जिसे भगवान् श्रीकृष्ण के इस कथन में इंगित किया गया है परन्तु इस अव्यक्त से परे अन्य सनातन अव्यक्त भाव है। इस प्रकार हम देखते है कि यहाँ व्यक्त सृष्टि के कारण को तथा चैतन्य तत्त्व दोनों को ही अव्यक्त कहा गया है। परन्तु दोनों में भेद यह है कि चैतन्य तत्त्व कभी भी व्यक्त होकर प्रमाणों का विषय नहीं बनता जबकि सृष्टि की कारणावस्था जो अव्यक्त कहलाती है कल्प के प्रारम्भ में सूक्ष्म तथा स्थूल रूप में व्यक्त भी होती है।अव्यक्त (वासनाएँ) व्यक्त सृष्टि की बीजावस्था है जिसे वेदान्त में अविद्या भी कहते हैं। अविद्या या अज्ञान स्वयं कोई वस्तु नहीं है किन्तु अज्ञान किसी विद्यमान वस्तु का ही हो सकता है। किसी मनुष्य को अपनी पूँछ का अज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि पूँछ अभावरूप है। इससे एक भावरूप परमार्थ सत्य का अस्तित्व सिद्ध होता है। जैसे कक्षा में पढ़ाये गये विषय ज्ञान के लिए श्यामपट अधिष्ठान है वैसे ही इस सृष्टि के लिए यह चैतन्य तत्त्व आधार है। इस सत्य को नहीं जानना ही अविद्या है जो इस परिवर्तनशील नामरूपमय सृष्टि को व्यक्त करती है। पुनः पुनः सर्ग स्थिति और लय को प्राप्त होने वाली इस अविद्याजनित सृष्टि से परे जो तत्त्व है उसी का संकेत यहाँ सन्ाातन अव्यय भाव इन शब्दों द्वारा किया गया है।क्या यह अव्यक्त ही परम तत्त्व है अथवा इस सनातन अव्यय से परे श्रेष्ठ कोई भाव जीवन का लक्ष्य बनने योग्य है
Swami Chinmayananda
।।8.20।। व्याख्या--'परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः'-- सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक ब्रह्मलोक तथा उससे नीचेके लोकोंको पुनरावर्ती कहा गया है। परन्तु परमात्मतत्त्व उनसे अत्यन्त विलक्षण है, -- यह बतानेके लिये यहाँ 'तु' पद दिया गया है।यहाँ 'अव्यक्तात्' पद ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरका ही वाचक है। कारण कि इससे पहले अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंमें सर्गके आदिमें ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे प्राणियोंके पैदा होनेकी और प्रलयमें ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरमें प्राणियोंके लीन होनेकी बात कही गयी है। इस श्लोकमें आया 'तस्मात्' पद भी ब्रह्माजीके उस सूक्ष्मशरीरका द्योतन करता है। ऐसा होनेपर भी यहाँ ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर-(समष्टि मन, बुद्धि और अहंकार-) से भी पर अर्थात् अत्यन्त विलक्षण जो भावरूप अव्यक्त कहा गया है, वह ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीरके साथ-साथ ब्रह्माजीके कारण-शरीर- (मूल प्रकृति-) से भी अत्यन्त विलक्षण है।ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे पर दो तत्त्व हैं--मूल प्रकृति और परमात्मा। यहाँ प्रसङ्ग मूल प्रकृतिका नहीं है, प्रत्युत परमात्माका है। अतः इस श्लोकमें परमात्माको ही पर और श्रेष्ठ कहा गया है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता। आगेके श्लोकमें भी 'अव्यक्तोऽक्षर' आदि पदोंसे उस परमात्माका ही वर्णन आया है।
गीतामें प्राणियोंके अप्रकट होनेको अव्यक्त कहा गया है--'अव्यक्तादीनि भूतानि' (2। 28); ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरको भी अव्यक्त कहा गया है (8। 18) प्रकृतिको भी अव्यक्त कहा गया है --'अव्यक्तमेव च' (13। 5) आदि। उन सबसे परमात्माका स्वरूप विलक्षण, श्रेष्ठ है, चाहे वह स्वरूप व्यक्त हो, चाहे अव्यक्त हो। वह भावरूप है अर्थात् किसी भी कालमें उसका अभाव हुआ नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। कारण कि वह सनातन है अर्थात् वह सदासे है और सदा ही रहेगा। इसलिये वह पर अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है। उससे श्रेष्ठ कोई हो ही नहीं सकता और होनेकी सम्भावना भी नहीं है।
Swami Ramsukhdas
Key teachings
Another unmanifested in the ancient or eternal Para Brahman Who is distinct from the Unmanifested (Avyakta or Primordial Nature), Who is of ite a different nature.
It is superior to Hiranyagarbha (the Cosmic Creative Intelligence) and the Unmanifested Nature because It is their cause.
It is not destroyed when all the beings from Brahma down to the ants or the blade of grass are destroyed.
Spiritual significance
In Akshara Brahma Yoga (Path of the Eternal God), this verse belongs to the Gita’s teaching on bhakti yoga. Here the text presents that teaching through these words: But verily, there exists higher than this Unmanifested, another Unmanifested Eternal, which is not destroyed even when all beings are destroyed.
Chapter 8, verse 20 is part of Akshara Brahma Yoga. In the English translation used on this page, it says: But verily, there exists higher than this Unmanifested, another Unmanifested Eternal, which is not destroyed even when all beings are destroyed.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Akshara Brahma Yoga, a chapter associated with Bhakti Yoga. The last thought at death.