prayāṇa-kāle—at the time of death; manasā—mind; achalena—steadily; bhaktyā—remembering with great devotion; yuktaḥ—united; yoga-balena—through the power of yog; cha—and; eva—certainly; bhruvoḥ—the two eyebrows; madhye—between; prāṇam—life airs; āveśhya—fixing; samyak—completely; saḥ—he; tam—him; param puruṣham—the Supreme Divine Lord; upaiti—attains; divyam—divine
English translation
At the time of death, with an unwavering mind, endowed with devotion, by the power of Yoga, fixing the whole life-breath in the middle of the two eyebrows, he reaches that resplendent Supreme Person.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।8.10।। वह (साधक) अन्तकाल में योगबल से प्राण को भ्रकुटि के मध्य सम्यक् प्रकार स्थापन करके निश्चल मन से भक्ति युक्त होकर उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
He who leaves the body with an unmoved mind, filled with devotion, and by the power of his meditation gathers his whole vital energy between his eyebrows, attains the Supreme.
Shri Purohit Swami
That person, endowed with a steady mind, devotion, and the power of yoga, reaches the Supreme Divine Soul at the time of departure, by properly fixing the life-breath between their eyebrows.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
The Yogi gets immense inner strength and power of concentration. His mind becomes ite steady through constant practice of concentration and meditation. He practises concentration first on the lower Chakras, viz., Muladhara, Svadhishthana and Manipura. He then concentrates on the lotus of the heart (Anahata Chakra). Then he takes the lifreath (Prana) through the Sushumna and fixes it in the middle of the two eyrows. He eventually attains the resplendent Supreme Purusha (Person) by the above Yogic practice.This is possible for one who has devoted his whole life to the practice of Yoga.
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।8.10।। इस श्लोक का केवल वाच्यार्थ लेकर प्रायः इसे विपरीत रूप से समझा जाता हैं जो कि वास्तव में इसका तात्पर्य नहीं है।गीता में प्रस्तुत प्रकरण का विषय है एकाग्र चित्त से परम पुरुष का ध्यान। अतः प्रयाणकाल से अभिप्राय अहंकार की मृत्यु के क्षण से समझना चाहिए। ध्यान साधना के द्वारा जब सजग रहकर शरीर मन और बुद्धि से हुए तादात्म्य को पूर्णतया निवृत्त किया जाता है तब साधक आन्तरिक शान्ति के स्थिर क्षण का अनुभव करता है। उस समय निश्चल मन से इस श्लोक में उपदिष्ट साधना का उसे पालन करना चाहिए।यहाँ भक्ति शब्द से सामान्य संसारी जनों की व्यापारिक पद्धति की भक्ति नहीं समझनी चाहिए। ईश्वर के लिए वह परम प्रेम जिसमें न किसी प्रकार की कामना है और न अपेक्षा जो प्रेम केवल प्रेम के लिए ही है भक्ति कहलाता है। प्रेम का अर्थ है अपने प्रियतम से वह तादात्म्य जिसमें प्रियतम के सुख और दुःख अपने स्वयं के ही सुखदुःख अनुभव होते हैं। संक्षेप में प्रेमी और प्रेमिका भक्त और ईश्वर परस्पर एकरूप हो जाते हैं। इसलिए श्री शंकराचार्य भक्ति का लक्षण बताते हैं स्वस्वरूपानुसन्धान भक्ति कहलाती है अर्थात् जीव का अपने सत्यस्वरूप के साथ एकत्व भक्ति है।प्रस्तुत श्लोक के सन्दर्भ में साधक को दी गई सबसे महत्व की सूचना यह है कि उसका ध्यानाभ्यास आत्मा के साथ एकरूप होने की तत्परता से युक्त हो। आत्मा का स्वरूप पूर्व श्लोक में विस्तार से बताया जा चुका है। आन्तरिक शान्ति के समय जब अहंकार की मृत्यु होती है तब साधक को आत्मस्वरूप में स्थित होकर रहना चाहिए।योगबलेन इस शब्द से किसी गुप्त रहस्यमयी कुण्डलिनी शक्ति के विषय में हम नहीं कह रहे हैं जिसके विषय में गुप्तता रखी जाती है और ईश्वर के भक्तों को भी सामान्यतः उसका रहस्य प्रकट नहीं किया जाता। योगबल से तात्पर्य साधक के उस बल से है जो उसे दीर्घकाल तक नियमित रूप से ध्यानाभ्यास करने के फलस्वरूप प्राप्त होता है। यह वह आन्तरिक शक्ति है जो मन के विषयों से तथा तज्जनित विक्षेपों से निवृत्त होने पर और बुद्धि के परम सत्य में स्थिर होने से प्राप्त होती है और निरन्तर समृद्ध होती जाती है।अल्पकाल में ही साधक अपने में ही मानसिक सन्तुलन रूपी सम्पत्ति और एक अवर्णनीय कार्यकुशलता को पाता है जिनकी सहायता से पूर्ण तत्परता के साथ ध्यान में वह एक चित्त हो जाता है। ध्यानाभ्यास में रत योगी के सम्पूर्ण प्राण उसके ध्यानबिन्दु में केन्द्रित हो जाते हैं जैसे यहाँ कहा गया है कि भ्रकुटी के मध्य में। यह भाग स्थिर विचार का स्थान माना जाता है।वेदान्त में प्राण से तात्पर्य केवल वायु से न होकर शरीर के विभिन्न अंगों में विभिन्न रूप से व्यक्त हो रही जीवनशक्ति से है। इस जीवनशक्ति (प्राण) का पाँच कार्यों के अनुसार पाँच विभागों में वर्गीकरण किया गया है जैसे प्राण विषय ग्रहण की क्रिया अपान मल विसर्जन व्यान सम्पूर्ण शरीर में रक्त आदि प्रवाहित करना समान पाचन क्रिया और उदान जिसके कारण हममें वह क्षमता होती है कि वर्तमान से परे भी ज्ञान को हम समझ सकें। इनके द्वारा हमारी बहुत सी शक्ति बिखर जाती है जो ध्यानाभ्यास के समय एक स्थान पर कुछ समय के लिए केन्द्रित हो जाती है। ध्यानमार्ग पर चलने वाले साधक के लिए तीव्र गति से की जाने वाली किसी शारीरिक साधना की आवश्यकता नहीं होती।ऐसे गहन ध्यान के क्षण में जिस साधक का मन पूर्णतया शान्त और निश्चल हो जाता है योगबल से प्राण भ्रकुटी के मध्य स्थित हो जाते हैं और जो परम श्रद्धा एवं उत्साह के साथ ध्येय आत्मतत्त्व के साथ एक रूप हो जाता है वह साधक उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।ओंकार पर किये जाने वाले ध्यान की प्रस्तावना के रूप में अगला श्लोक है --
Swami Chinmayananda
।।8.10।। व्याख्या --प्रयाणकाले मनसाचलेन ৷৷. स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्--यहाँ भक्ति नाम प्रियताका है; क्योंकि उस तत्त्वमें प्रियता (आकर्षण) होनेसे ही मन अचल होता है। वह भक्ति अर्थात् प्रियता स्वयंसे होती है, मन-बुद्धि आदिसे नहीं। अन्तकालमें कवि, पुराण, अनुशासिता आदि विशेषणोंसे (पीछेके श्लोकमें) कहे हुए सगुण-निराकार परमात्मामें भक्तियुक्त मनुष्यका मन स्थिर हो जाना अर्थात् सगुण-निराकार-स्वरूपमें आदरपूर्वक दृढ़ हो जाना ही मनका अचल होना है।पहले प्राणायामके द्वारा प्राणोंको रोकनेका जो अधिकार प्राप्त किया है, उसका नाम 'योगबल' है। उस योगबलके द्वारा दोनों भ्रुवोंके मध्यभागमें स्थित जो द्विदल चक्र है, उसमें स्थित सुषुम्णा नाड़ीमें प्राणोंका,अच्छी तरहसे प्रवेश करके वह (शऱीर छोड़कर दसवें द्वारसे होकर) दिव्य परम पुरुषको प्राप्त हो जाता है।
Swami Ramsukhdas
Key teachings
The Yogi gets immense inner strength and power of concentration.
His mind becomes ite steady through constant practice of concentration and meditation.
He practises concentration first on the lower Chakras, viz., Muladhara, Svadhishthana and Manipura.
Spiritual significance
In Akshara Brahma Yoga (Path of the Eternal God), this verse belongs to the Gita’s teaching on bhakti yoga. Here the text presents that teaching through these words: At the time of death, with an unwavering mind, endowed with devotion, by the power of Yoga, fixing the whole life-breath in the middle of the two eyebrows, he reaches that resplendent Supreme Person.
Chapter 8, verse 10 is part of Akshara Brahma Yoga. In the English translation used on this page, it says: At the time of death, with an unwavering mind, endowed with devotion, by the power of Yoga, fixing the whole life-breath in the middle of the two eyebrows, he reaches that resplendent Supreme Person.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Akshara Brahma Yoga, a chapter associated with Bhakti Yoga. The last thought at death.