Bhagavad Gita Chapter 7: Gyaan Vigyana Yoga

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 29

|| श्रीमद्भगवद्‌ गीता  7.29 ||

Chapter 7 · Gyaan Vigyana Yoga · Bhakti Yoga

Sanskrit verse

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्।।7.29।।

Transliteration

jarā-maraṇa-mokṣhāya mām āśhritya yatanti ye te brahma tadviduḥ kṛitsnam adhyātmaṁ karma chākhilam

Word meanings

jarā—from old age; maraṇa—and death; mokṣhāya—for liberation; mām—me; āśhritya—take shelter in; yatanti—strive; ye—who; te—they; brahma—Brahman; tat—that; viduḥ—know; kṛitsnam—everything; adhyātmam—the individual self; karma—karmic action; cha—and; akhilam—entire

English translation

Those who strive for liberation from old age and death, taking refuge in Me, realize in full that Brahman, the whole knowledge of the Self, and all action.

Translation by Swami Sivananda

Hindi meaning

।।7.29।। जो मेरे शरणागत होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।।  

Hindi rendering by Swami Tejomayananda

English meaning

Those who make Me their refuge, striving for liberation from decay and death, realize the Supreme Spirit, which is their own real Self, and in which all action finds its consummation.

Shri Purohit Swami

Those who, relying on Me, strive to achieve freedom from old age and death, realize all to be the Brahman and realize all the actions governing the Self.

Dr. S. Sankaranarayan

Detailed explanation

They attain to the full knowledge of the Self or perfect knowledge of Brahman. They attain to the Bhuma or the Highest or the Unconditioned. All their doubts are totally destroyed. They fully realise now, All is Vaasudeva. All indeed is Brahman. There is no such thing as diversity.They are not rorn here and have thus conered old age and death. They are liberated here and now.

Commentary by Swami Sivananda

Hindi commentary

।।7.29।। चित्तशुद्धि तथा ध्यानसाधना का प्रयोजन है जरा और मरण से मुक्ति पाना। आधुनिक काल में भी मनुष्य ऐसे उपायों को खोजने का प्रयत्न कर रहा है जिसके द्वारा जरा और मरण से मुक्ति मिल सके। उसकी अमृत्व की कल्पना यह है कि इस भौतिक देह का अस्तित्व सदा बना रहे परन्तु अध्यात्म शास्त्र में इसे अमृतत्त्व नहीं कहा है और न देह के नित्य अस्तित्व को जीवन का लक्ष्य बताया है।प्राणिमात्र के लिए जन्म वृद्धि व्याधि क्षय और मरण ये विकार अवश्यंभावी हैं। ये सभी विकार या परिवर्तन मनुष्य को असह्य पीड़ा दायक होते हैं। इनके अभाव में मनुष्य का जीवन अखण्ड आनन्दमय होता है। ध्यानाभ्यास में साधक का प्रयत्न इन परिवर्तनशील उपाधियों के साथ हुए तादात्म्य से ऊपर उठकर कालत्रयातीत मुक्त आत्मस्वरूप में स्थिति प्राप्त करने का होता है।योग्यता सम्पन्न साधक आत्मा का ध्यान करके अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप का साक्षात्कार करता है कि यह आत्मा मैं हूँ। यह आत्मा ही वह परम सत्य है जो समस्त ब्रह्माण्ड का अधिष्ठान है जिसे वेदान्त में ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। आत्मसाक्षात्कार का अर्थ ही ब्रह्मस्वरूप बनना है क्योंकि व्यक्ति की आत्मा ही भूतमात्र की आत्मा है। सत्य के इस अद्वैत को यहाँ इस प्रकार सूचित किया गया है कि जो साधक मुझ आत्मस्वरूप पर ध्यान करते हैं वे ब्रह्म को जानते हैं।ज्ञानी पुरुष के विषय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह न केवल सर्वव्यापी आत्मा का ज्ञाता है बल्कि स्वयं की सम्पूर्ण अध्यात्म अर्थात् मनोवैज्ञानिक शक्तियों का भी ज्ञाता है तथा वह सभी कर्मों में कुशल होता है। इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि आत्मानुभवी पुरुष जगत् व्यवहार में अकुशल और मूढ़ नहीं होता। अनुभवी पुरुषों का मत है कि केवल वही पुरुष वास्तविक अर्थ में जगत् की सेवा कर सकता है जिसे लोगों के मनोविज्ञान का पूर्ण ज्ञान है तथा अपने मन पर पूर्ण संयम है। सत्य का गीत गाने के लिए ऐसा पूर्णत्व प्राप्त व्यक्ति ही योग्यतम माध्यम है और ऐसे व्यक्ति का सुसंगठित और समस्त कार्यों में कुशल होना आवश्यक है।ज्ञानी पुरुषों के विषय में ही आगे कहते हैं

Swami Chinmayananda

।।7.29।। व्याख्या--'जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये'--यहाँ जरा (वृद्धावस्था) और मरणसे मुक्ति पानेका तात्पर्य यह नहीं है कि ब्रह्म अध्यात्म और कर्मका ज्ञान होनेपर वृद्धावस्था नहीं होगी शरीरकी मृत्यु नहीं होगी। इसका तात्पर्य यह है कि बोध होनेके बाद शरीरमें आनेवाली वृद्धावस्था और मृत्यु तो आयेगी ही पर ये दोनों अवस्थाएँ उसको दुःखी नहीं कर सकेंगी। जैसे तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें 'भूतप्रकृतिमोक्षम्' कहनेका तात्पर्य भूत और प्रकृति अर्थात् कार्य और कारणसे सम्बन्धविच्छेद होनेमें है ऐसे ही यहाँ 'जरामरणमोक्षाय' कहनेका तात्पर्य जरा मृत्यु आदि शरीरके विकारोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेमें है।जैसे कोई युवा पुरुष है तो उसकी अभी न वृद्धावस्था है और न मृत्यु है अतः वह जरामरणसे अभी मुक्त है। परन्तु वास्तवमें वह जरामरणसे मुक्त नहीं है क्योंकि जरामरणके कारण शरीरके साथ जबतक सम्बन्ध है तबतक जरामरणसे रहित होते हुए भी वह इनसे मुक्त नहीं है। परन्तु जो जीवन्मुक्त महापुरुष हैं उनके शरीरमें जरा और मरण होनेपर भी वे इनसे मुक्त हैं। अतः जरामरणसे मुक्त होनेका तात्पर्य है जिसमें जरा और मरण होते हैं ऐसे प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होना। जब मनुष्य शरीरके साथ तादात्म्य (मैं यही हूँ) मान लेता है तब शरीरके वृद्ध होनेपर मैं वृद्ध हो गया और शरीरके मरनेको लेकर मैं मर जाऊँगा ऐसा मानता है। यह मान्यता शरीर मैं हूँ और शरीर मेरा है इसीपर टिकी हुई है। इसलिये तेरहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें आया है 'जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्' अर्थात् जन्म मृत्यु जरा और व्याधिमें दुःखरूप दोषोंको देखना इसका तात्पर्य है कि शरीरके साथ मैं और मेरापन का सम्बन्ध न रहे। जब मनुष्य मैं और मेरापन से मुक्त हो जायगा तब वह जरा मरण आदिसे भी मुक्त हो जायगा क्योंकि शरीरके साथ माना हुआ सम्बन्ध ही वास्तवमें जन्मका कारण है-- 'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (गीता 13। 21)। वास्तवमें इसका शरीरके साथ सम्बन्ध नहीं है तभी सम्बन्ध मिटता है। मिटता वही है जो वास्तवमें नहीं होता।यहाँ 'मामाश्रित्य यतन्ति ये' पदोंमें आश्रय लेना और यत्न करना इन दो बातोंको कहनेका तात्पर्य है कि मनुष्य अगर स्वयं यत्न करता है तो अभिमान आता है कि मैंने ऐसा कर लिया जिससे ऐसा हो गया और अगर स्वयं यत्न न करके भगवान्के आश्रयसे सब कुछ हो जायगा ऐसा मानता है तो वह आलस्य और प्रमादमें तथा संग्रह और भोगमें लग जाता है। इसलिये यहाँ दो बातें बतायीं कि शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार स्वयं तत्परतासे उद्योग करे और उस उद्योगके होनेमें तथा उद्योगकी सफलतामें कारण भगवान्को माने।जो नित्यनिरन्तर वियुक्त हो रहा है ऐसे शरीरसंसारको मनुष्य प्राप्त और स्थायी मान लेता है। जबतक वह शरीर और संसारको स्थायी मानकर उसे महत्ता देता रहता है तबतक साधन करनेपर भी उसको भगवत्प्राप्ति नहीं होती। अगर वह शरीरसंसारको स्थायी न माने और उसको महत्त्व न दे तो भगवत्प्राप्तिमें देरी नहीं लगेगी। अतः इन दोनों बाधाओँको अर्थात् शरीरसंसारकी स्वतन्त्र सत्ताको और महत्ताको विचारपूर्वक हटाना ही यत्न करना है। परन्तु जो भगवान्का आश्रय लेकर यत्न करते हैं वे श्रेष्ठ हैं। उनका तो यही भाव रहता है कि उस प्रभुकी कृपासे ही साधनभजन हो रहा है। भगवान्की कृपाका आश्रय लेनेसे और अपने बलका अभिमान न करनेसे वे भगवान्के समग्ररूपको जान लेते हैं।जो भगवान्का आश्रय न लेकर अपना कल्याण चाहते हुए उद्योग करते हैं उनको अपनेअपने साधनके अनुसार भगवत्स्वरूपका बोध तो हो जाता है पर भगवान्के समग्ररूपका बोध उनको नहीं होता। जैसे कोई प्राणायाम आदिके द्वारा योगका अभ्यास करता है तो उसको अणिमा महिमा आदि सिद्धियाँ मिलती हैं और उनसे ऊँचा उठनेपर परमात्माके निराकारस्वरूपका बोध होता है अथवा अपने स्वरूपमें स्थिति होती है। ऐसे ही बौद्ध जैन आदि सम्प्रदायोंमें चलनेवाले जितने मनुष्य हैं जो कि ईश्वरको नहीं मानते वे भी अपनेअपने सम्प्रदायके सिद्धान्तोंके अनुसार साधन करके असत्जडरूप संसारसे सम्बन्धविच्छेद करके मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो संसारसे विमुख होकर भगवान्का आश्रय लेकर यत्न करते हैं उनको भगवान्के समग्ररूपका बोध होकर भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है यह विलक्षणता बतानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ 'मामाश्रित्य यतन्ति ये' कहा है।

Swami Ramsukhdas

Key teachings

  • They attain to the full knowledge of the Self or perfect knowledge of Brahman.
  • They attain to the Bhuma or the Highest or the Unconditioned.
  • All their doubts are totally destroyed.

Spiritual significance

In Gyaan Vigyana Yoga (Self-Knowledge and Enlightenment), this verse belongs to the Gita’s teaching on bhakti yoga. Here the text presents that teaching through these words: Those who strive for liberation from old age and death, taking refuge in Me, realize in full that Brahman, the whole knowledge of the Self, and all action.

This verse sits inside Chapter 7: Gyaan Vigyana Yoga, part of the Gita’s Bhakti Yoga section.

Questions about this verse

What is Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 29 about?

Chapter 7, verse 29 is part of Gyaan Vigyana Yoga. In the English translation used on this page, it says: Those who strive for liberation from old age and death, taking refuge in Me, realize in full that Brahman, the whole knowledge of the Self, and all action.

What is the spiritual context of this verse?

It appears in Gyaan Vigyana Yoga, a chapter associated with Bhakti Yoga. God as the source of all.