Some yogis perform sacrifice to the gods alone; while others, who have realized the Self, offer the Self as sacrifice in the fire of Brahman alone.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।4.25।। कोई योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ को ही करते हैं ; और दूसरे (ज्ञानीजन) ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करते हैं।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
Some sages sacrifice to the powers, while others offer themselves on the altar of the eternal.
Shri Purohit Swami
Certain other men of Yoga are completely devoted to yajna, connected with the devas, and offer that yajna, simply as a yajna, into the insatiable fire of the Brahman.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
Some Yogis who are devoted to Karma Yoga perform sacrificial rites to the shining ones or Devas (gods). The second Yajna is JnanaYajna or the wisdom sacrifice performed by those who are devoted to Jnana Yoga. The oblation in this sacrifice is the Self. Yajna here means the Self. The Upadhis or the limiting adjuncts such as the physical body, the mind, the intellect, etc., which are superimposed on Brahman through ignorance are sublated and the identity of the individual soul with the Supreme Soul or Brahman is realised. To sacrifice the self in Brahman is to know through direct cognition (Aparoksha Anubhuti) that the individual soul is identical with Brahman. This is the highest Yajna. Those who are established in Brahman, those who have realised their oneness with the Supreme Soul or Paramatma perform this kind of sacrifice. This is superior to all other sacrifices.
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।4.25।। जगत् में कार्य करते हुए ज्ञानी पुरुष के हृदय के भाव को ही कुछ श्लोकों में बताया गया है। साधक के मन में एक शंका सदैव उठती है कि ध्यानावस्था में बुद्धि से भी परे अर्थात् उसकी द्रष्टा आत्मा का साक्षात् अनुभव होता है परन्तु कुछ काल के लिये ही। गौतम बुद्ध जैसे कुछ महापुरुषों को हम कार्य में अत्याधिक व्यस्त देखते हैं जबकि कोई महात्मा एक स्थान पर ही रहकर अपने सीमित क्षेत्र में कार्य करते देखे जाते हैं जैसे भगवान् रमण महर्षि। कुछ अन्य सन्त सामान्य जीवन ही व्यतीत करते हैं। साधक को यह जानने की उत्सुकता रहती है कि जगत् में अनेक वस्तुओं के सम्पर्क में आने पर ज्ञानी पुरुष के मन की क्या भावना होती है।जो पुरुष सभी उपलब्ध साधनों के उपयोग से अपने आपको शारीरिक मानसिक एवं बौद्धिक अपूर्णताओं दुर्बलताओं से ऊँचा उठाने का सतत् प्रयत्न करता है वह योगी कहलाता है। इस दृष्टि से इस श्लोक के केवल सामान्य अर्थ को ही ग्रहण करना उचित नहीं होगा।जो प्रकाशरूप है उसे कहते हैं देव। अध्यात्म की दृष्टि से ये देव पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इन इन्द्रियों के द्वारा शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध ये पाँच विषय प्रकाशित किये जाते हैं। साधक तथा सिद्ध पुरुष भी इन्द्रियों के माध्यम से ही विषय ग्रहण करते हैं परन्तु उनकी दृष्टि में यह भी एक यज्ञ है जिसमें विषयों की आहुतियाँ इन्द्रियरूप देवों को दी जारही हैं। अज्ञानी के लिये जो विषयग्रहण की क्रिया मात्र है वही ज्ञानियों की दृष्टि से विषयों की इन्द्रियों के प्रति भक्ति की साधना है।यज्ञ की भावना बनाये रखने से साधक को धीरेधीरे उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट सभी प्रकार के इन्द्रियोपभोगों से वैराग्य हो जाता है जो आन्तरिक समता बनाये रखने में सहायक होता है।देवयज्ञ के वर्णन के बाद श्रीकृष्ण कहते हैं अन्य लोग ब्रह्मयज्ञ करते हैं जिसमें ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ (आत्मा) के द्वारा यज्ञ का (आत्मा का) हवन करते हैं। अध्यात्म की दृष्टि से विचार करने पर इस कथन का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। जब तक हम शरीर धारण किये हुए इस जगत् में रहते हैं तब तक विषयों के साथ हमारा सम्पर्क अवश्य रहता है। परन्तु हमें जो सुखदुख का अनुभव होता है वह बाह्य जगत् के कारण नहीं वरन् हमारे विषयों के प्रति रागद्वेष के कारण होता है। विषयों में स्वयं सुख या दुख देने की क्षमता नहीं है।ज्ञानी पुरुष जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषय ग्रहण की साधन मात्र हैं और वे केवल चैतन्य आत्मा के सानिध्य से ही कार्य कर सकती हैं। इस ज्ञान के कारण वे इन्द्रियों की ब्रह्मज्ञान की अग्नि में स्वयं ही आहुति देते हैं। यहाँ साधकों को उपदेश हैं कि वे अपनी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का उपयोग स्वार्थ के लिये न करके जगत् की सेवार्थ करें इससे वे जगत् में रहकर कार्य करते हुए भी विषयासक्ति के बन्धन में नहीं पड़ सकते।अगले श्लोक में भगवान् दो प्रकार के यज्ञ बताते हैं
Swami Chinmayananda
।।4.25।। व्याख्या--'दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते'-- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सर्वत्र ब्रह्मदर्शनरूप यज्ञ करनेवाले साधकका वर्णन किया। यहाँ भगवान् 'अपरे' पदसे उससे भिन्न प्रकारके यज्ञ करनेवाले साधकोंका वर्णन करते हैं।यहाँ 'योगिनः' पद यज्ञार्थ कर्म करनेवाले निष्काम साधकोंके लिये आया है।सम्पूर्ण क्रियाओं तथा पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर उन्हें केवल भगवान्का और भगवान्के लिये ही मानना 'दैवयज्ञ' अर्थात् भगवदर्पणरूप यज्ञ है। भगवान् देवोंके भी देव हैं ,इसलिये सब कुछ उनके अर्पण कर देनेको ही यहाँ 'दैवयज्ञ' कहा गया है।किसी भी क्रिया और पदार्थमें किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति, ममता और कामना न रखकर उन्हें सर्वथा भगवान्का मानना ही दैवयज्ञका भलीभाँति अनुष्ठान करना है।'ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति'--इस श्लोकके पूर्वार्धमें बताये गये दैवयज्ञसे भिन्न दूसरे यज्ञका वर्णन करनेके लिये यहाँ 'अपरे' पद आया है।चेतनका जडसे तादात्म्य होनेके कारण ही उसे जीवात्मा कहते हैं। विवेक-विचारपूर्वक जडसे सर्वथा विमुख होकर परमात्मामें लीन हो जानेको यहाँ यज्ञ कहा गया है। लीन होनेका तात्पर्य है--परमात्मतत्त्वसे भिन्न अपनी स्वतन्त्र सत्ता किञ्चिन्मात्र न रखना।
Swami Ramsukhdas
Key teachings
Some Yogis who are devoted to Karma Yoga perform sacrificial rites to the shining ones or Devas (gods).
The second Yajna is JnanaYajna or the wisdom sacrifice performed by those who are devoted to Jnana Yoga.
The oblation in this sacrifice is the Self.
Spiritual significance
In Jnana Karma Sanyasa Yoga (Path of Knowledge and the Disciplines of Action), this verse belongs to the Gita’s teaching on karma yoga. Here the text presents that teaching through these words: Some yogis perform sacrifice to the gods alone; while others, who have realized the Self, offer the Self as sacrifice in the fire of Brahman alone.
Chapter 4, verse 25 is part of Jnana Karma Sanyasa Yoga. In the English translation used on this page, it says: Some yogis perform sacrifice to the gods alone; while others, who have realized the Self, offer the Self as sacrifice in the fire of Brahman alone.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Jnana Karma Sanyasa Yoga, a chapter associated with Karma Yoga. Divine descent.