For verily, the true nature of action enjoined by the scriptures should be known, as well as that of forbidden or unlawful action, and of inaction; the nature of action is hard to understand.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।4.17।। कर्म का (स्वरूप) जानना चाहिये और विकर्म का (स्वरूप) भी जानना चाहिये ; (बोद्धव्यम्) तथा अकर्म का भी (स्वरूप) जानना चाहिये (क्योंकि) कर्म की गति गहन है।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
It is necessary to consider what is right action, what is wrong action, and what is inaction, for the law of action is mysterious.
Shri Purohit Swami
Something has to be understood about good action; something has to be understood about wrong action; and something has to be understood about non-action. It is difficult to comprehend the way of action.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
4.17 कर्मणः of action, हि for, अपि also, बोद्धव्यम् should be known, बोद्धव्यम् should be known, च and, विकर्मणः of the forbidden action, अकर्मणः of inaction, च and, बोद्धव्यम् should be known, गहना deep, कर्मणः of action, गतिः the path.No Commentary.
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।4.17।। जीवन क्रियाशील है। क्रिया की समाप्ति ही मृत्यु का आगमन है। क्रियाशील जीवन में ही हम उत्थान और पतन को प्राप्त हो सकते हैं। एक स्थान पर स्थिर जल सड़ता और दुर्गन्ध फैलाता है जबकि सरिता का प्रवाहित जल सदा स्वच्छ और शुद्ध बना रहता है। जीवन शक्ति की उपस्थिति में कर्मो का आत्यन्तिक अभाव नहीं हो सकता।चूँकि मनुष्य को जीवनपर्यन्त क्रियाशील रहना आवश्यक है इसलिये प्राचीन मनीषियों ने जीवन के सभी सम्भाव्य कर्मों का अध्ययन किया क्योंकि वे जीवन का मूल्यांकन उसके पूर्णरूप में करना चाहते थे। निम्नांकित तालिका में उनके द्वारा किये गये कर्मों का वर्गीकरण दिया हुआ है।क्रिया ही जीवन है। निष्क्रियता से उन्नति और अधोगति दोनों ही सम्भव नहीं। गहन निद्रा अथवा मृत्यु की कर्म शून्य अवस्था मनुष्य के विकास में न साधक है न बाधक।कर्म के क्षण मनुष्य का निर्माण करते हैं। यह निर्माण इस बात पर निर्भर करता है कि हम कौन से कर्मों को अपने हाथों में लेकर करते हैं। प्राचीन ऋषियों के अनुसार कर्म दो प्रकार के होते हैं निर्माणकारी (कर्तव्य) और विनाशकारी (निषिद्ध)। इस श्लोक के कर्म शब्द में मनुष्य के विकास में साधक के निर्माणकारी कर्तव्य कर्मों का ही समावेश है। जिन कर्मों से मनुष्य अपने मनुष्यत्व से नीचे गिर जाता है उन कर्मों को यहाँ विकर्म कहा है जिन्हें शास्त्रों ने निषिद्ध कर्म का नाम दिया है।कर्तव्य कर्मों का फिर तीन प्रकार से वर्गीकरण किया गया है और वे हैं नित्य नैमित्तिक और काम्य। जिन कर्मों को प्रतिदिन करना आवश्यक है वे नित्य कर्म तथा किसी कारण विशेष से करणीय कर्मों को नैमित्तिक कर्म कहा जाता है। इन दो प्रकार के कर्मों को करना अनिवार्य है। किसी फल विशेष को पाने के लिए उचित साधन का उपयोग कर जो कर्म किया जाता है उसे काम्य कर्म कहते हैं जैसे पुत्र या स्वर्ग पाने के लिये किया गया कर्म। यह सबके लिये अनिवार्य नहीं होता।आत्मविकास के लिये विकर्म का सर्वथा त्याग और कर्तव्य का सभी परिस्थितियों में पालन करना चाहिये। वैज्ञानिक पद्धति से किये हुए इस विश्लेषण में श्रीकृष्ण अकर्म की पूरी तरह उपेक्षा करते हैं।यह आवश्यक है कि अपने भौतिक अभ्युदय तथा आध्यात्मिक उन्नति के इच्छुक साधक कर्मों के इस वर्गीकरण को भली प्रकार समझें।भगवान् श्रीकृष्ण इस बात को स्वीकार करते हैं कि कर्मों के इस विश्लेषण के बाद भी सामान्य मनुष्य को कर्मअकर्म का विवेक करना सहज नहीं होता क्योंकि कर्म की गति गहन है।उपर्युक्त कथन से यह स्पष्ट होता है कि कर्म का मूल्यांकन केवल उसके वाह्य स्वरूप को देखकर नहीं बल्कि उसके उद्देश्य को भी ध्यान में रखते हुये करना चाहिये। उद्देश्य की श्रेष्ठता एवं शुचिता से उस व्यक्ति विशेष के कर्म श्रेष्ठ एवं पवित्र होंगे। इस प्रकार कर्म के स्वरूप का निश्चय करने में जब व्यक्ति का इतना प्राधान्य है तो भगवान् का यह कथन है कि कर्म की गति गहन है अत्यन्त उचित है।कर्म और अकर्म के विषय में और विशेष क्या जानना है इस पर कहते हैं
Swami Chinmayananda
4.17।। व्याख्या--'कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यम्'-- कर्म करते हुए निर्लिप्त रहना ही कर्मके तत्त्वको जानना है, जिसका वर्णन आगे अठारहवें श्लोकमें 'कर्मण्यकर्म यः पश्येत्' पदोंसे किया गया है।कर्म स्वरूपसे एक दीखनेपर भी अन्तःकरणके भावके अनुसार उसके तीन भेद हो जाते हैं--कर्म, अकर्म और विकर्म। सकामभावसे की गयी शास्त्रविहित क्रिया 'कर्म' बन जाती है। फलेच्छा, ममता और आसक्तिसे रहित होकर केवल दूसरोंके हितके लिये किया गया कर्म 'अकर्म' बन जाता है। विहित कर्म भी यदि दूसरेका हित करने अथवा उसे दुःख पहुँचानेके भावसे किया गया हो तो वह भी 'विकर्म' बन जाता है। निषिद्ध कर्म तो 'विकर्म' है ही।
Swami Ramsukhdas
Spiritual significance
In Jnana Karma Sanyasa Yoga (Path of Knowledge and the Disciplines of Action), this verse belongs to the Gita’s teaching on karma yoga. Here the text presents that teaching through these words: For verily, the true nature of action enjoined by the scriptures should be known, as well as that of forbidden or unlawful action, and of inaction; the nature of action is hard to understand.
4.17 कर्मणः of action, हि for, अपि also, बोद्धव्यम् should be known, बोद्धव्यम् should be known, च and, विकर्मणः of the forbidden action, अकर्मणः of inaction, च and, बोद्धव्यम् should be known, गहना deep, कर्मणः of action, गतिः the path.No Commentary.
Chapter 4, verse 17 is part of Jnana Karma Sanyasa Yoga. In the English translation used on this page, it says: For verily, the true nature of action enjoined by the scriptures should be known, as well as that of forbidden or unlawful action, and of inaction; the nature of action is hard to understand.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Jnana Karma Sanyasa Yoga, a chapter associated with Karma Yoga. Divine descent.