devān—celestial gods; bhāvayatā—will be pleased; anena—by these (sacrifices); te—those; devāḥ—celestial gods; bhāvayantu—will be pleased; vaḥ—you; parasparam—one another; bhāvayantaḥ—pleasing one another; śhreyaḥ—prosperity; param—the supreme; avāpsyatha—shall achieve
English translation
With this, nourish the gods, and may the gods nourish you; thus, nourishing each other, you shall attain the highest good.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।3.11।। तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
Worship the powers of Nature, and let them nourish you in return; thus, supporting each other, you shall attain your highest welfare.
Shri Purohit Swami
'You should gratify the devas with this, and let the devas gratify you; thus, mutually gratifying each other, you will attain the highest good.'
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
Deva literally means the shining one. By this sacrifice you nourish the gods such as Indra. The gods shall nourish you with rain, etc. the highest good is the attainment of the knowledge of the Self which frees one from the round of births and deaths. The highest good may mean the attainment of heaven also. The fruit depends upon the motive of the aspirant.
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।3.11।। वैदिक सिद्धार्न्त के अनुसार सर्वशक्तिमान् ईश्वर एक है। उसकी यह सर्वशक्ति प्रकृति में अनेक प्रकार से व्यक्त होकर सदैव कार्य करती है। विभिन्न प्रकार से व्यक्त परिच्छिन्न शक्तियों के विभिन्न नियामक हैं उन्हें देवता कहते हैं। इन सबके नाम भी वेदों में बताये हैं जैसे अग्नि वायु इन्द्र आदि।इस श्लोक के सर्वमान्य और सर्वत्र उपयुक्त होने के लिये देव शब्द का अर्थ यह समझना चाहिये कि वे किसी भी कर्म क्षेत्र का वह अधिष्ठाता देवता जो कर्म करने वाले कर्मचारी या कर्त्ता को फल प्रदान करता हो। वह देवता और कोई नहीं उस कर्म क्षेत्र की उत्पादन क्षमता ही होगी। जब हम किसी क्षेत्र विशेष में पूर्ण मनोयोग से परिश्रम करते हैं तब उस क्षेत्र की उत्पादन क्षमता प्रगट होकर हमें फल प्रदान करती है। यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है यदि हम समझने का प्रयत्न करें कि अपने देश को भारतमाता कहने का हमारा क्या तात्पर्य है। राष्ट्र की शक्ति को एक रूप देने में हमारा तात्पर्य उस राष्ट्र के सभी प्रकार के कर्मक्षेत्रों की उत्पादन क्षमता से ही होता है।इसमें कोई सन्देह नहीं कि कहीं पर भी निर्माण की जो क्षमता अव्यक्त रूप में रहती है उसे व्यक्त करने के लिये आवश्यक है केवल मनुष्य का परिश्रम। इस अव्यक्त क्षमता को कहते हैं देव। इन देवों को यज्ञ कर्म से प्रसन्न कर उनका आह्वान किये जाने पर वे प्रगट होकर यज्ञकर्ता को फल प्रदान कर प्रसन्न करेंगे। इस प्रकार परस्पर उन्नति कर मनुष्य परम श्रेय को प्राप्त करेगा यह ब्रह्माजी का दिव्य उद्देश्य इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने बताया।इस सेवाधर्म का पालन प्रकृति में सर्वत्र होता दिखाई देता है। एक मात्र मनुष्य ही है जिसे स्वेच्छा से कर्म करने की स्वतन्त्रता दी गई है इस सार्वभौमिक सेवाधर्मयज्ञ भावना का पालन करने पर वह शुभफल प्राप्त करता है परन्तु जिस सीमा तक अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित हुआ वह कर्म करेगा उतना ही वह दुख पायेगा क्योंकि प्रकृति के सामंजस्य में वह विरोध उत्पन्न करता है।और
Swami Chinmayananda
।।3.11।। व्याख्या--'सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः' ब्रह्माजी प्रजा (सृष्टि) के रचयिता एवं उसके स्वामी हैं; अतः अपने कर्तव्यका पालन करनेके साथ वे प्रजाकी रक्षा तथा उसके कल्याणका विचार करते रहते हैं। कारण कि जो जिसे उत्पन्न करता है, उसकी रक्षा करना उसका कर्तव्य हो जाता है। ब्रह्माजी प्रजाकी रचना करते, उसकी रक्षामें तत्पर रहते तथा सदा उसके हितकी बात सोचते हैं। इसलिये वे 'प्रजापति' कहलाते हैं।
सृष्टि अर्थात् सर्गके आरम्भमें ब्रह्माजीने कर्तव्य-कर्मोंकी योग्यता और विवेक-सहित मनुष्योंकी रचना की है (टिप्पणी प0 128)। अनुकूल और प्रतिकूल-परिस्थितिका सदुपयोग कल्याण करनेवाला है। इसलिये ब्रह्माजीने अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करनेका विवेक साथ देकर ही मनुष्योंकी रचना की है।सत्-असत् विचार करनेमें पशु, पक्षी वृक्ष, आदिके द्वारा स्वाभाविक परोपकार (कर्तव्यपालन) होता है; किन्तु मनुष्यको तो भगवत्कृपासे विशेष विवेक-शक्ति मिली हुई है। अतः यदि वह अपने विवेकको महत्त्व देकर अकर्तव्य न करे तो उसके द्वारा भी स्वाभाविक लोक-हितार्थ कर्म हो सकते हैं।देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य, तथा अन्य पशु, पक्षी, वृक्ष आदि सभी प्राणी प्रजा हैं। इनमें भी योग्यता, अधिकार और साधनकी विशेषताके कारण मनुष्यपर अन्य सब प्राणियोंके पालनकी जिम्मेवारी है। अतः यहाँ 'प्रजाः' पद विशेषरूपसे मनुष्योंके लिये ही प्रयुक्त हुआ है।कर्मयोग अनादिकालसे चला आ रहा है। चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'पुरातनः' पदसे भी भगवान् कहते हैं कि यह कर्मयोग बहुत कालसे प्रायः लुप्त हो गया था, जिसको मैंने तुम्हें फिरसे कहा है। उसी बातको यहाँ भी 'पुरा' पदसे वे दूसरी रीतिसे कहते हैं कि 'मैंने ही नहीं प्रत्युत ब्रह्माजीने भी सर्गके आदिकालमें कर्तव्यसहित प्रजाको रचकर उनको उसी कर्मयोगका आचरण करनेकी आज्ञा दी थी। तात्पर्य यह है कि कर्मयोग(निःस्वार्थभावसे कर्तव्यकर्म करने) की परम्परा अनादिकालसे ही चली आ रही है। यह कोई नयी बात नहीं है।'
Swami Ramsukhdas
Key teachings
Deva literally means the shining one.
By this sacrifice you nourish the gods such as Indra.
The gods shall nourish you with rain, etc.
Spiritual significance
In Karma Yoga (Path of Selfless Service), this verse belongs to the Gita’s teaching on karma yoga. Here the text presents that teaching through these words: With this, nourish the gods, and may the gods nourish you; thus, nourishing each other, you shall attain the highest good.
This verse sits inside Chapter 3: Karma Yoga, part of the Gita’s Karma Yoga section.
Chapter 3, verse 11 is part of Karma Yoga. In the English translation used on this page, it says: With this, nourish the gods, and may the gods nourish you; thus, nourishing each other, you shall attain the highest good.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Karma Yoga, a chapter associated with Karma Yoga. Action versus inaction.