अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति।।2.17।।
Transliteration
avināśhi tu tadviddhi yena sarvam idaṁ tatam
vināśham avyayasyāsya na kaśhchit kartum arhati
Word meanings
avināśhi—indestructible; tu—indeed; tat—that; viddhi—know; yena—by whom; sarvam—entire; idam—this; tatam—pervaded; vināśham—destruction; avyayasya—of the imperishable; asya—of it; na kaśhchit—no one; kartum—to cause; arhati—is able
English translation
Know that to be indestructible, by which all this is pervaded. No one can cause the destruction of that, the Imperishable.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।2.17।। उस वस्तु को तुम अविनाशी जानों, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस अव्यय का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
And know That to be indestructible, by Which all this (universe) is pervaded; no one is capable of causing destruction to this unchanging One.
Dr. S. Sankaranarayan
But know that to be indestructible by which all this is pervaded. No one can bring about the destruction of this immutable.
Swami Gambirananda
Hindi commentary
।।2.17।। समस्त जगत् को जो व्याप्त किये हुये है और इस दृश्यमान अनुभव में आने वाले जगत् का जो अधिष्ठान है वह सत् है। मिट्टी के बने अनेक प्रकार के पात्र होते हैं जिनके विभिन्न उपयोगों के कारण अथवा उनमें रखी वस्तुओं के कारण उनके विभिन्न नाम होते हैं परंतु विविध आकारों के होने पर भी वे सब एक मिट्टी के ही बने होते हैं जो सब आकारों में व्याप्त होती है और जिसके बिना किसी भी पात्र का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। उन सब की उत्पत्ति स्थिति और लय मिट्टी में ही है। अत उनमें मिट्टी ही वास्तव में सत्य है।
इसी प्रकार यह नित्य परिवर्तनशील जगत् नित्य अविनाशी तत्त्व से व्याप्त है और भगवान् कहते हैं कि इस तत्त्व का विनाश कदापि सम्भव नहीं है।
तब फिर असत् क्या है जिसका अस्तित्व नित्य नहीं है सुनो
Swami Chinmayananda
।।2.17।। व्याख्या-- 'अविनाशि तु तद्विद्धि'-- पूर्वश्लोकमें जो सत्-असत् की बात कही थी, उसमेंसे पहले 'सत्' की व्याख्या करनेके लिये यहाँ 'तु' पद आया है।
'उस अविनाशी तत्त्वको तू समझ'--ऐसा कहकर भगवान्ने उस तत्वको परोक्ष बताया है। परोक्ष बतानेमें तात्पर्य है कि इदंतासे दीखनेवाले इस सम्पूर्ण संसारमें वह परोक्ष तत्त्व ही व्याप्त है, परिपूर्ण है। वास्तवमें जो परिपूर्ण है, वही 'है' और जो सामने संसार दीख रहा है, यह 'नहीं' है।
यहाँ 'तत्' पदसे सत्त-त्त्वको परोक्षरीतिसे कहनेका तात्पर्य यह नहीं है कि वह तत्त्व बहुत दूर है; किन्तु वह इन्द्रियों और अन्तःकरणका विषय नहीं है, इसलिये उसको परोक्षरीतिसे कहा गया है।
'येन सर्वमिदं ततम् (टिप्पणी प'0 57.1)--जिसको परोक्ष कहा है उसीका वर्णन करते हैं कि यह सब-का-सब संसार उस नित्य-तत्त्वसे व्याप्त है। जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंमें सोना, लोहेसे बने हुए अस्त्र-शस्त्रोंमें लोहा, मिट्टीसे बने हुए बर्तनोंमें मिट्टी और जलसे बनी हुई बर्फमें जल ही व्याप्त (परिपूर्ण) है, ऐसे ही संसारमें वह सत्त-त्त्व ही व्याप्त है। अतः वास्तवमें इस संसारमें वह सत्त-त्त्व ही जाननेयोग्य है।
'विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति'--यह शरीरी अव्यय (टिप्पणी प0 57.2) अर्थात् अविनाशी है। इस अविनाशीका कोई विनाश कर ही नहीं सकता। परन्तु शरीर विनाशी है-- क्योंकि वह नित्य-निरन्तर विनाशकी तरफ जा रहा है। अतः इस विनाशीके विनाशको कोई रोक ही नहीं सकता। तू सोचता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा तो ये नहीं मरेंगे, पर वास्तवमें तेरे युद्ध करनेसे अथवा न करनेसे इस अविनाशी और विनाशी तत्त्वमें कुछ फरक नहीं पड़ेगा अर्थात् अविनाशी तो रहेगा ही और विनाशीका नाश होगा ही।
यहाँ 'अस्य' पदसे सत्त-त्त्वको इदंतासे कहनेका तात्पर्य है कि प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरोंमें जो सत्ता दीखती है, वह इसी सत्त-त्त्वकी ही है। 'मेरा शरीर है और मैं शरीरधारी हूँ'--ऐसा जो अपनी सत्ताका ज्ञान है, उसीको लक्ष्य करके भगवान्ने यहाँ 'अस्य' पद दिया है।
Swami Ramsukhdas
Key teachings
Know that to be indestructible, by which all this is pervaded.
No one can cause the destruction of that, the Imperishable.
Spiritual significance
In Sankhya Yoga (Transcendental Knowledge), this verse belongs to the Gita’s teaching on karma yoga. Here the text presents that teaching through these words: Know that to be indestructible, by which all this is pervaded. No one can cause the destruction of that, the Imperishable.
Chapter 2, verse 17 is part of Sankhya Yoga. In the English translation used on this page, it says: Know that to be indestructible, by which all this is pervaded. No one can cause the destruction of that, the Imperishable.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Sankhya Yoga, a chapter associated with Karma Yoga. The immortal self.