सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।18.64।।
Transliteration
sarva-guhyatamaṁ bhūyaḥ śhṛiṇu me paramaṁ vachaḥ
iṣhṭo ‘si me dṛiḍham iti tato vakṣhyāmi te hitam
Word meanings
sarva-guhya-tamam—the most confidential of all; bhūyaḥ—again; śhṛiṇu—hear; me—by me; paramam—supreme; vachaḥ—instruction; iṣhṭaḥ asi—you are dear; me—to me; dṛiḍham—very; iti—thus; tataḥ—because; vakṣhyāmi—I am speaking; te—for your; hitam—benefit
English translation
Hear again My supreme word, most secret of all; for you are dearly beloved of Me, I will tell you what is good.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।18.64।। पुन: एक बार तुम मुझसे समस्त गुह्यों में गुह्यतम परम वचन (उपदेश) को सुनो। तुम मुझे अतिशय प्रिय हो, इसलिए मैं तुम्हें तुम्हारे हित की बात कहूंगा।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
Listen to My last word once more, the deepest secret of all; you are My beloved, you are My friend, and I speak for your welfare.
Shri Purohit Swami
Yet again, you must listen to My ultimate, supreme message—the highest secret of all. You are My dear one and have a firm intellect, so I shall tell you what is good for you.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
Now listen once more with rapt attention to My words. Thou art very dear to Me. Thou art a sincere aspirant. Therefore I am telling thee this most mysterious truth. Hear from Me this mystery of all mysteries. I shall tell it to you again to make a deep impression on your mind, although it has been declared more than once. I do not hope to get any reward from thee. Thou art My most beloved friend and disciple. Therefore I will speak what is good for thee, the means of attaining Selfrealisation. This is the supreme good or the highest of all kinds of good for thee.
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।18.64।। सम्भवत? जब भगवान् ने यह देखा कि अर्जुन अभी तक कुछ निश्चित निर्णय नहीं ले पा रहा है? तब स्नेहवश वे पुन अपने उपदेश के मुख्य सिद्धांत को दोहराने का वचन देते हैं। इस पुनरुक्ति का प्रमुख कारण केवल मित्रप्रेम और अर्जुन के हित की कामना ही है।वह गुह्यतम उपदेश क्या है
Swami Chinmayananda
।।18.64।। व्याख्या -- सर्वगुह्यतमं भूयः श्रुणु मे परमं वचः -- पहले तिरसठवें श्लोकमें भगवान्ने गुह्य (कर्मयोगकी) और गुह्यतर (अन्तर्यामी निराकारकी शरणागतिकी) बात कही और इदं तु ते गुह्यतमम् (9। 1) तथा इति गुह्यतमं शास्त्रम् (15। 20) -- इन पदोंसे गुह्यतम (अपने प्रभावकी) बात कह दी? पर सर्वगुह्यतम बात गीतामें पहले कहीं नहीं कही। अब यहाँ अर्जुनकी घबराहटको देखकर भगवान् कहते हैं कि मैं सर्वगुह्यतम अर्थात् सबसे अत्यन्त गोपनीय बात फिर कहूँगा? तू मेरे परम? सर्वश्रेष्ठ वचनोंको सुन।इस श्लोकमें सर्वगुह्यतमम् पदसे भगवान्ने बताया कि यह हरेकके सामने प्रकट करनेकी बात नहीं है और सड़सठवें श्लोकमें इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन पदसे भगवान्ने बताया कि इस बातको असहिष्णु और अभक्तसे कभी मत कहना। इस प्रकार दोनों तरफसे निषेध करके बीचमें (छियासठवें श्लोकमें) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- इस सर्वगुह्यतम बातको रखा है। दोनों तरफसे निषेध करनेका तात्पर्य है कि यह गीताभरमें अत्यन्त रहस्यमय खास उपदेश है। (टिप्पणी प0 966)दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें धर्मसम्मूढचेताः कहकर अर्जुन अपनेको धर्मका निर्णय करनेमें अयोग्य समझते हुए भगवान्से पूछते हैं? उसके शिष्य बनते हैं और शिक्षा देनेके लिये कहते हैं। अतः भगवान् यहाँ (18। 66 में) कहते हैं कि तू धर्मके निर्णयका भार अपने ऊपर मत ले? वह भार मेरेपर छोड़ दे -- मेरे ही अर्पण कर दे और अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा। फिर तेरेको जो पाप आदिका डर है? उन सब पापोंसे मैं तुझे मुक्त कर दूँगा। तू सब चिन्ताओंको छोड़ दे। यही भगवान्का सर्वगुह्यतम परम वचन है।भूयः श्रृणु का तात्पर्य है कि मैंने यही बात दूसरे शब्दोंमें पहले भी कही थी? पर तुमने ध्यान नहीं दिया। अतः मैं फिर वही बात कहता हूँ। अब इस बातपर तुम विशेषरूपसे ध्यान दो।यह सर्वगुह्यतमवाली बात भगवान्ने पहले मत्परः ৷৷. मच्चित्तः सततं भव (18। 57) और मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादत्तरिष्यसि (18। 58) पदोंसे कह दी थी परन्तु सर्वगुह्यतमम् पद पहले नहीं कहा? और अर्जुनका भी उस बातपर लक्ष्य नहीं गया। इसलिये अब फिर उस बातपर अर्जुनका लक्ष्य करानेके लिये और,उस बातका महत्त्व बतानेके लिये भगवान् यहाँ सर्वगुह्यतमम् पद देते हैं।इष्टोऽसि मे दृढमिति -- इससे पहले भगवान्ने कहा था कि जैसी मरजी आये? वैसा कर। जो अनुयायी है? आज्ञापालक है? शरणागत है? उसके लिये ऐसी बात कहनेके समान दूसरा क्या दण्ड दिया जा सकता है अतः इस बातको सुनकर अर्जुनके मनमें भय पैदा हो गया कि भगवान् मेरा त्याग कर रहे हैं। उस भयको दूर करनेके लिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि तुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो (टिप्पणी प0 967.1)।यदि अर्जुनके मनमें भय या संदेह न होता? तो भगवान्कोतुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो -- यह कहकर सफाई देनेकी क्या जरूरत थी सफाई देना तभी बनता है? जब दूसरेके मनमें भय हो? सन्देह हो? हलचल हो। इष्टः कहनेका दूसरा भाव यह है कि भगवान् अपने शरणागत भक्तको अपना ईष्टदेव मान लेते हैं। भक्त सब कुछ छोड़कर केवल भगवान्को अपना इष्ट मानता है? तो भगवान् भी उसको अपना इष्ट मान लेते हैं क्योंकि भक्तिके विषयमें भगवान्का यह कानून है -- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् (गीता 4। 11) अर्थात् जो भक्त जैसे मेरे शरण होते हैं? मैं भी उनको वैसे ही आश्रय देता हूँ। भगवान्की दृष्टिमें भक्तके समान और कोई श्रेष्ठ नहीं है। भागवतमें भगवान् उद्धवजीसे कहते हैं -- तुम्हारेजैसे प्रेमी भक्त मुझे जितने प्यारे हैं? उतने प्यारे न ब्रह्माजी हैं? न शंकरजी हैं? न बलरामजी हैं और तो क्या? मेरे शरीरमें निवास करनेवाली लक्ष्मीजी और मेरी आत्मा भी उतनी प्यारी नहीं है (टिप्पणी प0 967.2)।दृढम् कहनेका तात्पर्य है कि जब तुमने एक बार कह दिया कि मैं आपके शरण हूँ (2। 7) तो अब तुम्हें बिलकुल भी भय नहीं करना चाहिये। कारण कि जो मेरी शरणमें आकर एक बार भी सच्चे हृदयसे कह देता है कि मैं आपका ही हूँ ? उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय (सुरक्षित) कर देता हूँ -- यह मेरा व्रत है (टिप्पणी प0 967.3)। ततो वक्ष्यामि ते हितम् -- तू मेरा अत्यन्त प्यारा मित्र है? इसलिये अपने हृदयकी अत्यन्त गोपनीय और अपने दरबारकी श्रेष्ठसेश्रेष्ठ बात तुझे कहूँगा। दूसरी बात? मैं जो आगे शरणागतिकी बात कहूँगा? उसका यह तात्पर्य नहीं है कि मेरी शरणमें आनेसे मुझे कोई लाभ हो जायगा? प्रत्युत इसमें केवल तेरा ही हित होगा। इससे सिद्ध होता है कि प्राणिमात्रका हित केवल इसी बातमें है कि वह किसी दूसरेका सहारा न लेकर केवल भगवान्की ही शरण ले।भगवान्की शरण होनेके सिवाय जीवका कहीं भी? किञ्चन्मात्र भी हित नहीं है। कारण यह है कि जीव साक्षात् परमात्माका अंश है। इसलिये वह परमात्माको छोड़कर किसीका भी सहारा लेगा तो वह सहारा टिकेगा नहीं। जब संसारकी कोई भी वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? अवस्था आदि स्थिर नहीं है? तो फिर उनका सहारा कैसे स्थिर रह सकता है उनका सहारा तो रहेगा नहीं? पर चिन्ता? शोक? दुःख आदि रह जायँगे जैसे? अग्निसे अङ्गार दूर हो जाता है तो वह काला कोयला बन जाता है -- कोयला होय नहीं उजला? सौ मन साबुन लगाय। पर वही कोयला जब पुनः अग्निसे मिल जाता है? तब वह अङ्गार (अग्निरूप) बन जाता है और चमक उठता है। ऐसे ही यह जीव भगवान्से विमुख हो जाता है तो बारबार जन्मतामरता और दुःख पाता रहता है? पर जब यह भगवान्के सम्मुख हो जाता है अर्थात् अनन्यभावसे भगवान्की शरणमें हो जाता है? तब यह भगवत्स्वरूप बन जाता है और चमक उठता है? तथा संसारमात्रका कल्याण करनेवाला हो जाता है।
Swami Ramsukhdas
Key teachings
Now listen once more with rapt attention to My words.
Therefore I am telling thee this most mysterious truth.
Hear from Me this mystery of all mysteries.
Spiritual significance
In Moksha Sanyaas Yoga (Yoga through the Perfection of Renunciation and Surrender), this verse belongs to the Gita’s teaching on jnana yoga. Here the text presents that teaching through these words: Hear again My supreme word, most secret of all; for you are dearly beloved of Me, I will tell you what is good.
Chapter 18, verse 64 is part of Moksha Sanyaas Yoga. In the English translation used on this page, it says: Hear again My supreme word, most secret of all; for you are dearly beloved of Me, I will tell you what is good.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Moksha Sanyaas Yoga, a chapter associated with Jnana Yoga. Tyaga and sannyasa.