सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।।18.56।।
Transliteration
sarva-karmāṇy api sadā kurvāṇo mad-vyapāśhrayaḥ
mat-prasādād avāpnoti śhāśhvataṁ padam avyayam
Word meanings
sarva—all; karmāṇi—actions; api—though; sadā—always; kurvāṇaḥ—performing; mat-vyapāśhrayaḥ—take full refuge in me; mat-prasādāt—by my grace; avāpnoti—attain; śhāśhvatam—the eternal; padam—abode; avyayam—imperishable
English translation
Having taken refuge in Me and doing all actions, by My grace he obtains the eternal, indestructible state of being.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।18.56।। जो पुरुष मदाश्रित होकर सदैव समस्त कर्मों को करता है, वह मेरे प्रसाद (अनुग्रह) से शाश्वत, अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
Relying on Me in all his actions and doing them for My sake, he attains, by My grace, eternal and unchangeable life.
Shri Purohit Swami
Performing all his actions all the time and taking refuge in Me, he attains, through My grace, the eternal, changeless state.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
Worshipping Me with the flowers of his good actions he reaches the imperishable Brahmic seat of ineffable splendour through My grace. He attains union with Me and enjoys the supreme bliss. If by chance he commits some prohibited actions, still, as in the Ganga (Indias most holy river) the waters of the drains and roads find union, so My devotee, becoming united with Me, is unaffected by these prohibited actions.Worship of the Lord through ones duties purifies the heart of the aspirant and prepares him for the devotion to knowledge which eventually leads him to the attainment of Selfrealisation. The Yoga of Devotion is eulogised here.All actions Good actions and even the prohibited actions. He who takes shelter in Me, Vaasudeva, the Lord, with his whole self centred in Me attains the eternal abode of Vishnu, by the grace of the Lord.
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।18.56।। गीता का तत्त्वज्ञान अत्यन्त जीवन्त और शक्तिशाली है। सरल और सामान्य प्रतीत होने वाला? भगवान् का यह दिव्य गान मानो शक्ति के किसी विस्फोटक पदार्थ का भंडार है जिसे सम्यक् ज्ञान द्वारा विस्फोटित किया जा सकता है।इसके उपदेशानुसार जीवन जीने की उष्णता पाकर वह भण्डार फूट पड़ता है। उसके विस्फोट से एक साधक के श्रेष्ठ एवं दिव्य व्यक्तित्व की संभावनाओं पर जमी हुई अज्ञान की वे समस्त पर्तें ध्वस्त हो जाती हैं। गीता के अनुसार? केवल निष्क्रिय समर्पण अथवा कर्मकाण्ड का अनुष्ठान ही भक्ति नहीं है। कर्तृत्व और भोक्तृत्व के अभिमान का परित्याग कर परमात्मा से तादात्म्य स्थापित करना भक्ति है। भगवान् श्रीकृष्ण इस बात पर भी विशेष बल देते हैं कि साधक को अपने ज्ञान एवं अनुभव को व्यावहारिक जीवन में भी जीने का पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए।भगवान् श्रीकृष्ण के मतानुसार धर्म की पूर्णता विषयों से केवल विरति और निजानुभूति में ही नहीं हैं। उनका यह निश्चित मत है कि ज्ञानी पुरुष को आत्मानुभव के पश्चात् पुन व्यावहारिक जगत् में आकर कर्म करने चाहिए। परन्तु ये कर्म निजानुभव की शान्ति और आनन्द से सुरभित हों? जिससे कि यह मन्द और म्लान जगत् तेजोमय और कान्तिमय बन जाये। इसलिए? परम भक्त बनने के लिए एक और आवश्यक गुण का वर्णन इस श्लोक में किया गया है।निस्वार्थ समाज सेवा के अधिकार पत्र के बिना? गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण न तो किसी भक्त का स्वागत करना चाहते हैं और न किसी को अपना दर्शन देना चाहते हैं। उनकी यह स्पष्ट घोषणा है? जो पुरुष मदाश्रित होकर समस्त कर्म करता है? वह मेरे प्रसाद से अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है।ईश्वरार्पण की भावना से ही कर्तृत्वाभिमान को त्यागा जा सकता है। इस भावना से कर्तव्य पालन करने वाले साधक को ईश्वर का प्रसाद? अर्थात् अनुग्रह (कृपा) प्राप्त होता है।अपनी कृपा से भिन्न ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं है? ईश्वर ही स्वयं अपनी कृपा है और उसकी कृपा ही वह स्वयं है। अत कृपाप्राप्ति का अभिप्राय यह है कि जिस मात्रा में साधक का अन्तकरण शान्त? शुद्ध? स्थिर और सुगठित होगा? उसी मात्रा में उसे परमात्मनुभूति स्पष्ट होगी। परमात्मा नित्य (शाश्वत) और अविकारी (अव्यय) है। इसलिए? भगवान् कहते हैं कि उत्तम साधक उनकी कृपा से शाश्वत? अव्यय पद को प्राप्त होता है।प्रस्तुत प्रकरण में? भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञान? भक्ति एवं कर्म मार्गों को इंगित किया है। इन सबका लक्ष्य एक ही है साधक का साध्य के साथ एकत्व का अनुभव। सम्पूर्ण साधना गीतोपदेश का सार है। कर्म? भक्ति और ज्ञान की संयुक्त रूप में साधना करने से हमारे व्यक्तित्व के शारीरिक? मानसिक एवं बौद्धिक इन तीनों पक्षों में सामञ्जस्य आ जाता है। कर्मयोग? भक्तियोग एवं ज्ञानयोग का क्रमश शरीर? मन और बुद्धि के स्तर पर पालन करने के लिए गीता में उपदेश दिया गया है। इस प्रकार? द्रष्टामन्ताज्ञाता रूप जीव को अपने आत्मस्वरूप में पूर्ण स्थिति सिद्ध कराने में गीतोपदेश का प्रमुख योगदान है। हिन्दुओं की औपनिषदिक संस्कृति के पुनरुत्थान में गीता का महत्वपूर्ण स्थान है।इस प्रकार? ब्रह्मप्राप्ति की साधना का क्रमबद्धविवेचन करने के पश्चात्? उपदेश देते हैं कि
Swami Chinmayananda
।।18.56।। व्याख्या -- मद्व्यपाश्रयः -- कर्मोंका? कर्मोंके फलका? कर्मोंके पूरा होने अथवा न होनेका? किसी घटना? परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति आदिका आश्रय न हो। केवल मेरा ही आश्रय (सहारा) हो। इस तरह जो सर्वथा मेरे ही परायण हो जाता है? अपना स्वतन्त्र कुछ नहीं समझता? किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानता? सर्वथा मेरे आश्रित रहता है? ऐसे भक्तको अपने उद्धारके लिये कुछ करना नहीं पड़ता। उसका उद्धार मैं कर देता हूँ (गीता 12। 7) उसको अपने जीवननिर्वाह या साधनसम्बन्धी किसी बातकी कमी नहीं रहती सबकी मैं पूर्ति कर देता हूँ (गीता 9। 22) -- यह मेरा सदाका एक विधान है? नियम है? जो कि सर्वथा शरण हो जानेवाले हरेक प्राणीको प्राप्त हो सकता है (गीता 9। 30 -- 32)।सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणः -- यहाँ कर्माणि पदके साथ सर्व और कुर्वाणः पदके साथ सदा पद देनेका तात्पर्य है कि जिस ध्यानपरायण सांख्ययोगीने शरीर? वाणी और मनका संयमन कर लिया है अर्थात् जिसने शरीर आदिकी क्रियाओंको संकुचित कर लिया है और एकान्तमें रहकर सदा ध्यानयोगमें लगा रहता है? उसको जिस पदकी प्राप्ति होती है? उसी पदको लौकिक? पारलौकिक? सामाजिक? शारीरिक आदि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको हमेशा करते हुए भी मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है।हरेक व्यक्तिको यह बात तो समझमें आ जाती है कि जो एकान्तमें रहता है और साधनभजन करता है? उसका कल्याण हो जाता है परन्तु यह बात समझमें नहीं आती कि जो सदा मशीनकी तरह संसारका सब काम करता है? उसका कल्याण कैसे होगा उसका कल्याण हो जाय? ऐसी कोई युक्ति नहीं दीखती क्योंकि ऐसे तो सब लोग कर्म करते ही रहते हैं। इतना ही नहीं? मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं? पर उन सबका कल्याण होता हुआ दीखता नहीं और शास्त्र भी ऐसा कहता नहीं इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं -- मत्प्रसादात्। तात्पर्य यह है कि जिसने केवल मेरा ही आश्रय ले लिया है? उसका कल्याण मेरी कृपासे हो जायगा? कौन है मना करनेवालायद्यपि प्राणिमात्रपर भगवान्का अपनापन और कृपा सदासर्वदा स्वतःसिद्ध है? तथापि यह मनुष्य जबतक असत् संसारका आश्रय लेकर भगवान्से विमुख रहता है? तबतक भगवत्कृपा उसके लिये फलीभूत नहीं होती अर्थात् उसके काममें नहीं आती। परन्तु यह मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर ज्योंज्यों दूसरा आश्रय छोड़ता जाता है? त्योंहीत्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता चला जाता है? और ज्योंज्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता जाता है? त्योंहीत्यों भगवत्कृपाका अनुभव होता जाता है। जब सर्वथा भगवान्का आश्रय ले लेता है? तब उसे भगवान्की कृपाका पूर्ण अनुभव हो जाता है।अवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् -- स्वतःसिद्ध परमपदकी प्राप्ति अपने कर्मोंसे? अपने पुरुषार्थसे अथवा अपने साधनसे नहीं होती। यह तो केवल भगवत्कृपासे ही होती है। शाश्वत अव्ययपद सर्वोत्कृष्ट है। उसी परमपदको भक्तिमार्गमें परमधाम? सत्यलोक? वैकुण्ठलोक? गोलोक? साकेतलोक आदि कहते हैं और ज्ञानमार्गमें विदेहकैवल्य? मुक्ति? स्वरूपस्थिति आदि कहते हैं। वह परमपद तत्त्वसे एक होते हुए भी मार्गों और उपासनाओंका भेद होनेसे उपासकोंकी दृष्टिसे भिन्नभिन्न कहा जाता है (गीता 8। 21 14। 27)। भगवान्का चिन्मय लोक एक देशविशेषमें होते हुए भी सब जगह व्यापकरूपसे परिपूर्ण है। जहाँ भगवान् हैं? वहीं उनका लोक भी है क्योंकि भगवान् और उनका लोक तत्त्वसे एक ही हैं। भगवान् सर्वत्र विराजमान हैं अतः उनका लोक भी सर्वत्र विराजमान (सर्वव्यापी) है। जब भक्तकी अनन्य निष्ठा सिद्ध हो जाती है? तब परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव हो जाता है और वही लोक उसके सामने प्रकट हो जाता है अर्थात् उसे यहाँ जीतेजी ही उस लोककी दिव्य लीलाओंका अनुभव होने लगता है। परन्तु जिस भक्तकी ऐसी धारणा रहती है कि वह दिव्य लोक एक देशविशेषमें ही है? तो उसे उस लोककी प्राप्ति शरीर छोड़नेपर ही होती है। उसे लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आते हैं और कहींकहीं स्वयं भगवान् भी आते हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें अपना सामान्य विधान (नियम) बताकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके लिये विशेषरूपसे आज्ञा देते हैं।
Swami Ramsukhdas
Key teachings
Worshipping Me with the flowers of his good actions he reaches the imperishable Brahmic seat of ineffable splendour through My grace.
He attains union with Me and enjoys the supreme bliss.
The Yoga of Devotion is eulogised here.All actions Good actions and even the prohibited actions.
Spiritual significance
In Moksha Sanyaas Yoga (Yoga through the Perfection of Renunciation and Surrender), this verse belongs to the Gita’s teaching on jnana yoga. Here the text presents that teaching through these words: Having taken refuge in Me and doing all actions, by My grace he obtains the eternal, indestructible state of being.
Chapter 18, verse 56 is part of Moksha Sanyaas Yoga. In the English translation used on this page, it says: Having taken refuge in Me and doing all actions, by My grace he obtains the eternal, indestructible state of being.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Moksha Sanyaas Yoga, a chapter associated with Jnana Yoga. Tyaga and sannyasa.