jyotiṣhām api taj jyotis tamasaḥ param uchyate
jñānaṁ jñeyaṁ jñāna-gamyaṁ hṛidi sarvasya viṣhṭhitam
Word meanings
jyotiṣhām—in all luminarie; api—and; tat—that; jyotiḥ—the source of light; tamasaḥ—the darkness; param—beyond; uchyate—is said (to be); jñānam—knowledge; jñeyam—the object of knowledge; jñāna-gamyam—the goal of knowledge; hṛidi—within the heart; sarvasya—of all living beings; viṣhṭhitam—dwells
English translation
That Light of all lights is said to be beyond darkness: knowledge, the knowable, and the goal of knowledge, seated in the hearts of all.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।13.18।। (वह ब्रह्म) ज्योतियों की भी ज्योति और (अज्ञान) अन्धकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान (चैतन्यस्वरूप) ज्ञेय और ज्ञान के द्वारा जानने योग्य (ज्ञानगम्य) है। वह सभी के हृदय में स्थित है।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
It is the light of lights, beyond the reach of darkness; the wisdom, the only thing worth knowing or that wisdom can teach; the presence in the hearts of all.
Shri Purohit Swami
This is the Light of all lights, stated to be beyond darkness; it is to be known by the above knowledge; it is to be attained only through knowledge; and it distinctly remains in the heart of all.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
The Supreme Self illumines the intellect, the mind, the sun, moon, stars, fire and lightning. It is selfluminous, The sun does not shine there, nor do the moon and the stars, nor do these lightnings shine and much less this fire. When It shines, everything shines after It all these shine by Its Light. (Kathopanishad 5.15 also Svetasvataropanishad 6.14)Knowledge Such as humility. (Cf.XIII.7to11)The knowable As described in verses 12 to 7.The goal of knowledge, i.e., capable of being understood by wisdom.These three are installed in the heart (Buddhi) of every living being. Though the light of the sun shines in all objects, yet the suns light shines more brilliantly in all bright and clean objects such as a mirror. Even so, though Brahman is present in all objects, the intellect shines with special effulgence received from Brahman. (Cf.X.20XIII.3XVIII.61)
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।13.18।। ब्रह्म ही वह एक चैतन्यस्वरूप प्रकाश है? जिसके द्वारा सभी बौद्धिक ज्ञान अन्तर्प्रज्ञा और अनुभव प्रकाशित होते हैं। उसके कारण ही हमें अपने विविध ज्ञानों तथा अनुभवों का बोध या भान होता है? इसलिए उसकी तुलना प्रकाश या ज्योति से की जाती है। केवल हमारे नेत्र के समक्ष होने से ही बाह्य वस्तुओं का हमें दर्शन नहीं हो सकता वरन् किसी बाह्य प्रकाश से उनका प्रकाशित होना भी आवश्यक होता है। इस लौकिक अनुभव को दृष्टान्त स्वरूप मानें? तो यह भी स्वीकार करना होगा कि हमारी आन्तरिक भावनाओं और विचारों को भी प्रकाशित करने वाला कोई अन्तर्प्रकाश होना चाहिए? अन्यथा इन वृत्तियों का हमें बोध ही नहीं हो सकता था। अन्तकरण की वृत्तिय्ाों के इस प्रकाशक को ही स्वयं प्रकाश आत्मा? या आत्मज्योति कहा जाता है। इस चैतन्य को प्रकाश या ज्योति कहना आध्यात्मिक शास्त्र की परम्परा है।वेदान्त अध्ययन के प्रारम्भिक काल में? शास्त्रीय भाषा से अनभिज्ञ होने के कारण? जिज्ञासु साधकगण प्रकाश शब्द से लौकिक प्रकाश ही समझते हैं। परन्तु यह धारणा यथार्थ नहीं है? क्योंकि लौकिक प्रकाश तो दृश्यवर्ग में आता है? जबकि आत्मा तो सर्वद्रष्टा है। अत? दृश्यप्रकाश आत्मा नहीं हो सकता और न आत्मा इस प्रकाश के समान हो सकता है। इसलिए? यह आवश्यक हो जाता है कि गुरु? इस आत्मप्रकाश या आत्मज्योति जैसे शब्दों का वास्तविक तात्पर्य स्पष्ट करें।ज्योतियों की ज्योति द्रष्टा को लक्षित करने के लिए सर्वप्रथम सम्पूर्ण दृश्यवर्ग का निषेध करना होगा? अर्थात् वे आत्मा नहीं हैं? यह सिद्ध करना होगा। प्रकाश के जो स्रोत सूर्य? चन्द्रमा? तारागण? विद्युत् और अग्नि हमें ज्ञात हैं? उनमें किसी में भी आत्मा को प्रकाशित करने की सार्मथ्य नहीं है। उसके समक्ष ये सब निष्प्रभ हो जाते हैं। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण उस आत्मा को ज्योतियों की ज्योति कहते हैं? जो सभी लौकिक दृश्य ज्योतियों को भी प्रकाशित करती है स्वयं प्रकाश कहे जाने वाले इस सूर्य का हमें भान तक नहीं होता? यदि चैतन्यतत्त्व इसे प्रकाशित न कर रहा होता। संसार के सुख और दुख से हम केवल तभी प्रभावित होते हैं जब हमें उनका भान होता है। और यह भान केवल चैतन्य के प्रकाश से ही सम्भव है। इसलिए? चैतन्य को सम्पूर्ण दृश्य वर्ग का प्रकाशक कहा गया है।वह अन्धकार के परे है इतना अधिक स्पष्ट करने पर भी? लौकिक प्रकाश के ज्ञान का संस्कार शिष्य की बुद्धि में अत्यन्त दृढ़ होने के कारण वह फिर उसे प्रकाश की सापेक्ष धारणा के रूप में ही ग्रहण करता है। हम बाह्य प्रकाश को अन्धकार के विरोधी के रूप में ही जानते और समझते हैं। सूर्य के लिए प्रकाश शब्द का कोई अर्थ नहीं है? क्योंकि सूर्य को अन्धकार ज्ञात ही नहीं है अत? आत्मा के पारमार्थिक चैतन्यस्वरूप को दर्शाने के लिए यहाँ कहा गया है कि वह अन्धकार की कल्पना के भी परे है।यह चैतन्य का प्रकाश ऐसा सूक्ष्म है कि वह प्रकाश और अन्धकार दोनों को ही प्रकाशित करता है। उसका किसी से कोई विरोध नहीं है। भगवान् के इस कथन का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि आत्मा वह प्रकाश है? जो हमारे अन्तकरण की ज्ञान (प्रकाश) और अज्ञान (अन्धकार) इन दोनों ही वृत्तियों का प्रकाशक है परन्तु वह स्वयं इन दोनों से ही असंस्पृष्ट रहता है।इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में तीन शब्दों ज्ञान? ज्ञेय और ज्ञानगम्य के द्वारा इस आत्मा या ब्रह्म का ही निर्देश किया गया है। वह ब्रह्म ज्ञान अर्थात् चैतन्यस्वरूप है ब्रह्म ही जानने योग्य ज्ञेय वस्तु है? क्योंकि उसके ज्ञान से ही संसार निवृत्ति हो सकती है। यह ब्रह्म ज्ञानगम्य है अर्थात् अमानित्वादि गुणों से सम्पन्न शुद्ध अन्तकरण के द्वारा अनुभव गम्य है।वह सबके हृदय में स्थित है यदि कोई ऐसा अनन्तस्वरूप चैतन्य तत्त्व है? जो सर्वाभासक है और जिसके बिना जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं है? तो निश्चित ही वह जानने योग्य है। उसे प्राप्त करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य हो सकता है। उसका अन्वेषण कहाँ करें कौनसी तीर्थयात्रा पर हमें जाना होगा क्या हम ऐसी साहसिक यात्रा के सक्षम हैं सामान्यत? लोग ऐसे ही प्रश्न पूछते हैं? जिससे यह ज्ञात होता है कि वे आत्मा को अपने से भिन्न कोई वस्तु समझते हैं? जिसकी प्राप्ति किसी देशान्तर या कालान्तर में होने की उनकी धारणा होती है। ऐसी समस्त विपरीत धारणाओं की निवृत्ति के लिए यहाँ स्पष्ट और साहसिक घोषणा की गयी है कि वह अनन्त परमात्मा सबके हृदय में ही स्थित है।दार्शनिक दृष्टि से? हृदय शब्द का अर्थ शुद्ध मन से होता है? जो समस्त आदर्श और पवित्र भावनाओं का उदय स्थान माना जाता है। आन्तरिक शुद्धि के इस वातावरण में? जब बुद्धि उस पारमार्थिक आत्मतत्त्व का ध्यान करती है? जो सर्वातीत होते हुए सर्वव्यापक भी है? तब वह स्वयं ही आत्मस्वरूप बन जाती है। यही आत्मानुभूति है। इसीलिए? हृदय को आत्मा का निवास स्थान माना गया है। स्वहृदय में स्थित आत्मा का अनुभव ही अनन्त ब्रह्म का अनुभव है? क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है।इस प्रकरण का उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं
Swami Chinmayananda
।।13.18।। व्याख्या -- ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः -- ज्योति नाम प्रकाश(ज्ञान) का है अर्थात् जिनसे प्रकाश मिलता है? ज्ञान होता है? वे सभी ज्योति हैं। भौतिक पदार्थ सूर्य? चन्द्र? नक्षत्र? तारा? अग्नि? विद्युत् आदिके प्रकाशमें दीखते हैं अतः भौतिक पदार्थोंकी ज्योति (प्रकाशक) सूर्य? चन्द्र आदि हैं।वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्दोंका ज्ञान कानसे होता है अतः शब्दकी ज्योति (प्रकाशक) कान है। शीतउष्ण? कोमलकठोर आदिके स्पर्शका ज्ञान त्वचासे होता है अतः स्पर्शकी ज्योति (प्रकाशक) त्वचा है। श्वेत? नील? पीत आदि रूपोंका ज्ञान नेत्रसे होता है अतः रूपकी ज्योति (प्रकाशक) नेत्र है। खट्टा? मीठा? नमकीन आदि रसोंका ज्ञान जिह्वासे होता है अतः रसकी ज्योति (प्रकाशक) जिह्वा है। सुगन्धदुर्गन्धका ज्ञान नाकसे होता है अतः गन्धकी ज्योति (प्रकाशक) नाक है। इन पाँचों इन्द्रियोंसे शब्दादि पाँचों विषयोंका ज्ञान तभी होता है? जब उन इन्द्रियोंके साथ मन रहता है। अगर उनके साथ मन न रहे तो किसी भी विषयका ज्ञान नहीं होता। अतः इन्द्रियोंकी ज्योति (प्रकाशक) मन है। मनसे विषयोंका ज्ञान होनेपर भी जबतक बुद्धि उसमें नहीं लगती? बुद्धि मनके साथ नहीं रहती? तबतक उस विषयका स्पष्ट और स्थायी ज्ञान नहीं होता। बुद्धिके साथ रहनेसे ही उस विषयका स्पष्ट और स्थायी ज्ञान होता है। अतः मनकी ज्योति (प्रकाशक) बुद्धि है। बुद्धिसे कर्तव्यअकर्तव्य? सत्असत्? नित्यअनित्यका ज्ञान होनेपर भी अगर स्वयं (कर्ता) उसको धारण नहीं करता? तो वह बौद्धिक ज्ञान ही रह जाता है वह ज्ञान जीवनमें? आचरणमें नहीं आता। वह बात स्वयंमें नहीं बैठती। जो बात स्वयंमें बैठ जाती है? वह फिर कभी नहीं जाती। अतः बुद्धिकी ज्योति (प्रकाशक) स्वयं है। स्वयं भी परमात्माका अंश है और परमात्मा अंशी है। स्वयंमें ज्ञान? प्रकाश परमात्मासे ही आता है। अतः स्वयंकी ज्योति (प्रकाशक) परमात्मा है। उस स्वयंप्रकाश परमात्माको कोई भी प्रकाशित नहीं कर सकता।तात्पर्य यह हुआ कि परमात्माका प्रकाश (ज्ञान) स्वयंमें आता है। स्वयंका प्रकाश बुद्धिमें? बुद्धिका प्रकाश मनमें? मनका प्रकाश इन्द्रियोंमें और इन्द्रियोंका प्रकाश विषयोंमें आता है। मूलमें इन सबमें प्रकाश परमात्मासे ही आता है। अतः इन सब ज्योतियोंका ज्योति? प्रकाशकोंका प्रकाशक परमात्मा ही है (टिप्पणी प0 692)। जैसे एकएकके पीछे बैठे हुए परीक्षार्थी अपनेसे आगे बैठे हुएको तो देख सकते हैं? पर अपनेसे पीछे बैठे हुएको नहीं? ऐसे ही अहम्? बुद्धि? मन? इन्द्रियाँ आदि भी अपनेसे आगेवालेको तो देख (जान) सकते हैं? पर अपनेसे पीछेवालेको नहीं। जैसे सबसे पीछे बैठा हुआ परीक्षार्थी अपने आगे बैठे हुए समस्त परीक्षार्थियोंको देख सकता है? ऐसे ही परमप्रकाशक परमात्मा अहम्? बुद्धि? मन? इन्द्रियाँ आदि सबको देखता है? प्रकाशित करता है? पर उसको कोई प्रकाशित नहीं कर सकता। वह परमात्मा सम्पूर्ण चरअचर जगत्का समानरूपसे निरपेक्ष प्रकाशक है -- यस्य भासा सर्वमिदं विभाति सचराचम् (श्रीमद्भा0 10। 13। 55)। वहाँ प्रकाशक? प्रकाश और प्रकाश्य -- यह त्रिपुटी नहीं है।तमसः परमुच्यते -- वह परमात्मा अज्ञानसे अत्यन्त परे अर्थात् सर्वथा असम्बद्ध और निर्लिप्त है। इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि और अहम् -- इनमें तो ज्ञान और अज्ञान दोनों आतेजाते हैं परन्तु जो सबका परम प्रकाशक है? उस परमात्मामें अज्ञान कभी आता ही नहीं? आ सकता ही नहीं और आना सम्भव ही नहीं। जैसे सूर्यमें अँधेरा कभी आता ही नहीं? ऐसे ही उस परमात्मामें अज्ञान कभी आता ही नहीं। अतः उस परमात्माको अज्ञानसे अत्यन्त परे कहा गया है।ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यम् -- उस परमात्मामें कभी अज्ञान नहीं आता। वह स्वयं ज्ञानस्वरूप है और उसीसे सबको प्रकाश मिलता है। अतः उस परमात्माको ज्ञान अर्थात् ज्ञानस्वरूप कहा गया है।इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदिके द्वारा भी (जाननेमें आनेवाले) विषयोंका ज्ञान होता है? पर वे अवश्य जाननेयोग्य नहीं हैं क्योंकि उनको जान लेनेपर भी जानना बाकी रह जाता है? जानना पूरा नहीं होता। वास्तवमें अवश्य जाननेयोग्य तो एक परमात्मा ही है -- अवसि देखिअहिं देखन जोगू।। ( मानस 1। 229। 3)। उस परमात्माको जान लेनेके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रहता। पन्द्रहवें अध्यायमें भगवान्ने अपने लिये कहा है कि सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य मैं ही हूँ (15। 15) जो मुझे जान लेता है? वह सर्ववित् हो जाता है (15। 19)। अतः परमात्माको ज्ञेय कहा गया है।इसी अध्यायके सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक जिन अमानित्वम् आदि साधनोंका ज्ञानके नामसे वर्णन किया गया है? उस ज्ञानके द्वारा असत्का त्याग होनेपर परमात्माको तत्त्वसे जाना जा सकता है। अतः उस परमात्माको ज्ञानगम्य कहा गया है।हृदि सर्वस्य विष्ठितम् -- वह परमात्मा सबके हृदयमें नित्यनिरन्तर विराजमान है। तात्पर्य है कि यद्यपि वह परमात्मा सब देश? काल? वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? अवस्था आदिमें परिपूर्णरूपसे व्यापक है? तथापि उसका प्राप्तिस्थान तो हृदय ही है।उस परमात्माका अपने हृदयमें अनुभव करनेका उपाय है -- (1) मनुष्य हरेक विषयको जानता है तो उस जानकारीमें सत् और असत् -- ये दोनों रहते हैं। इन दोनोंका विभाग करनेके लिये साधक यह अनुभव करे कि मेरी जो जाग्रत्? स्वप्न? सुषुप्ति और बालकपन? जवानी? बुढ़ापा आदि अवस्थाएँ तो भिन्नभिन्न हुईं? पर मैं एक रहा। सुखदायीदुःखदायी? अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियाँ आयीं और चली गयीं? पर उनमें मैं एक ही रहा। देश? काल? वस्तु? व्यक्ति आदिका संयोगवियोग हुआ? पर उनमें भी मैं एक ही रहा। तात्पर्य यह हुआ कि अवस्थाएँ? परिस्थितियाँ? संयोगवियोग तो भिन्नभिन्न (तरहतरहके) हुए? पर उन सबमें जो एक ही रहा है? भिन्नभिन्न नहीं हुआ है? उसका (उन सबसे अलग करके) अनुभव करे। ऐसा करनेसे जो सबके हृदयमें विराजमान है? उसका अनुभव हो जायगा क्योंकि यह स्वयं परमात्मासे अभिन्न है।(2) जैसे अत्यन्त भूखा अन्नके बिना और अत्यन्त प्यासा जलके बिना रह नहीं सकता? ऐसे ही उस परमात्माके बिना रह नहीं सके? बेचैन हो जाय। उसके बिना न भूख लगे? न प्यास लगे और न नींद आये। उस परमात्माके सिवाय और कहीं वृत्ति जाय ही नहीं। इस तरह परमात्माको पानेके लिये व्याकुल हो जाय तो अपने हृदयमें उस परमात्माका अनुभव हो जायगा।इस प्रकार एक बार हृदयमें परमात्माका अनुभव हो जानेपर साधकको सब जगह परमात्मा ही हैं -- ऐसा अनुभव हो जाता है। यही वास्तविक अनुभव है। सम्बन्ध -- पहले श्लोकसे सत्रहवें श्लोकतक क्षेत्र? ज्ञान और ज्ञेयका जो वर्णन हुआ है? अब आगेके श्लोकमें फलसहित उसका उपसंहार करते हैं।
Swami Ramsukhdas
Key teachings
The Supreme Self illumines the intellect, the mind, the sun, moon, stars, fire and lightning.
It is selfluminous, The sun does not shine there, nor do the moon and the stars, nor do these lightnings shine and much less this fire.
When It shines, everything shines after It all these shine by Its Light.
Spiritual significance
In Ksetra Ksetrajna Vibhaaga Yoga (Yoga through Distinguishing the Field and the Knower of the Field), this verse belongs to the Gita’s teaching on jnana yoga. Here the text presents that teaching through these words: That Light of all lights is said to be beyond darkness: knowledge, the knowable, and the goal of knowledge, seated in the hearts of all.
Chapter 13, verse 18 is part of Ksetra Ksetrajna Vibhaaga Yoga. In the English translation used on this page, it says: That Light of all lights is said to be beyond darkness: knowledge, the knowable, and the goal of knowledge, seated in the hearts of all.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Ksetra Ksetrajna Vibhaaga Yoga, a chapter associated with Jnana Yoga. Body as the field.