Thou lickest up, devouring all the worlds on every side with Thy flaming mouths. Thy fierce rays, filling the whole world with radiance, burn, O Vishnu!
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।11.30।। हे विष्णो! आप प्रज्वलित मुखों के द्वारा इन समस्त लोकों का ग्रसन करते हुए आस्वाद ले रहे हैं, आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत् को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
You seem to swallow up the worlds, lapping them in flame. Your glory fills the universe. Your fierce rays beat down upon it irresistibly.
Shri Purohit Swami
Devouring, on all sides with Your blazing mouths, the entire worlds, You are licking up; Your terrible rays scorch the entire universe, filling it with their radiance, O Vishnu!
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
11.30 लेलिह्यसे (Thou) lickest, ग्रसमानः devouring, समन्तात् on every side, लोकान् the worlds, समग्रान् all, वदनैः with mouths, ज्वलद्भिः flaming, तेजोभिः with radiance, आपूर्य filling, जगत् the world, समग्रम् the whole, भासः rays, तव Thy, उग्राः fierce, प्रतपन्ति are burning, विष्णो O VishnuCommentary Vishnu means allpervading, Vyapanasila.
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।11.30।। महाऊर्मि के कुछ श्लोकों की रचना के बाद व्यासजी पुन अपने पूर्व के विषय को प्रारम्भ करते हैं। जगत् के समस्त प्राणीवर्ग काल के मुख में प्रवेश करके नष्ट हुए जा रहे हैं। इस काल तत्त्व की क्षुधा कभी न शान्त होने वाली है। समस्त लोकों का ग्रसन करते हुए आप उनका आस्वाद ले रहे हैं।वस्तुत? यह श्लोक सृष्टि? स्थिति और संहार के तीन कर्ताओं के पीछे के सिद्धान्त को स्पष्ट करता है। यद्यपि हम इन तीनों की भिन्नभिन्न रूप से कल्पना करते हैं? किन्तु वास्तव में ये तीनों एक ही प्रक्रिया के तीन पहलू मात्र हैं। हम पहले भी विस्तार से देख चुके हैं कि सर्वत्र विद्यमान अस्तित्त्व का मूल रहस्य है रचनात्मक विध्वंस।चलचित्र गृह में विभिन्न चित्रों की एक रील को प्रकाशवृत्त के सामने चलाया जाता है। उसके सामने से दूर हुये चित्र को हम मृत कह सकते हैं और सम्मुख उपस्थित हुये को जन्मा हुआ मान सकते हैं। निरंतर हो रही जन्ममृत्यु की इस धारा के कारण सामने के परदे पर एक अखण्ड कथानक का आभास निर्माण होता है। देश और काल से अवच्छिन्न होकर वस्तुएं? प्राणी मात्र? घटनाएं और परिस्थितियाँ हमारे अनुभव में आकर चली जाती हैं और उनके इस आवागमन के सातत्य को हम अस्तित्त्व या जीवन कहते हैं।उपर्युक्त विचार को पारस्परिक त्रिमूर्ति ब्रह्मा? विष्णु और महेश की भाषा में पुराणों में व्यक्त किया गया है।इस ज्ञान की दृष्टि से जब अर्जुन उस प्रकाशस्वरूप देदीप्यमान समष्टि रूप को देखता है? तब वह उस विराट् के उग्र प्रकाश से प्राय अन्धवत् हो जाता है।क्योंकि आप उग्ररूप हैं? इसलिए
Swami Chinmayananda
।।11.30।। व्याख्या--'लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान् समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः'--आप सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार कर रहे हैं और कोई इधर-उधर न चला जाय, इसलिये बार-बार जीभके लपेटेसे अपने प्रज्वलित मुखोंमें लेते हुए उनका ग्रसन कर रहे हैं। तात्पर्य है कि कालरूप भगवान्की जीभके लपेटसे कोई भी प्राणी बच नहीं सकता।'तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो'--विराट्रूप भगवान्का तेज बड़ा उग्र है। वह उग्र तेज सम्पूर्ण जगत्में परिपूर्ण होकर सबको संतप्त कर रहा है, व्यथित कर रहा है।
सम्बन्ध--विराट्रूप भगवान् अपने विलक्षणविलक्षण रूपोंका दर्शन कराते ही चले गये। उनके भयंकर और अत्यन्त उग्ररूपके मुखोंमें सम्पूर्ण प्राणी और दोनों पक्षोंके योद्धा जाते देखकर अर्जुन बहुत घबरा गये। अतः अत्यन्त उग्ररूपधारी भगवान्का वास्तविक परिचय जाननेके लिये अर्जुन प्रश्न करते हैं।
Swami Ramsukhdas
Spiritual significance
In Vishwaroopa Darshana Yoga (Yoga through Beholding the Cosmic Form of God), this verse belongs to the Gita’s teaching on bhakti yoga. Here the text presents that teaching through these words: Thou lickest up, devouring all the worlds on every side with Thy flaming mouths. Thy fierce rays, filling the whole world with radiance, burn, O Vishnu!
Chapter 11, verse 30 is part of Vishwaroopa Darshana Yoga. In the English translation used on this page, it says: Thou lickest up, devouring all the worlds on every side with Thy flaming mouths. Thy fierce rays, filling the whole world with radiance, burn, O Vishnu!
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Vishwaroopa Darshana Yoga, a chapter associated with Bhakti Yoga. The cosmic form.