Bhagavad Gita Chapter 10: Vibhooti Yoga

Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 39

|| श्रीमद्भगवद्‌ गीता  10.39 ||

Chapter 10 · Vibhooti Yoga · Bhakti Yoga

Sanskrit verse

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन। न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।।10.39।।

Transliteration

yach chāpi sarva-bhūtānāṁ bījaṁ tad aham arjuna na tad asti vinā yat syān mayā bhūtaṁ charācharam

Word meanings

yat—which; cha—and; api—also; sarva-bhūtānām—of all living beings; bījam—generating seed; tat—that; aham—I; arjuna—Arjun; na—not; tat—that; asti—is; vinā—without; yat—which; syāt—may exist; mayā—me; bhūtam—creature; chara-acharam—moving and nonmoving

English translation

And whatever is the seed of all beings, that too am I, O Arjuna; there is no being, be it moving or unmoving, that can exist without Me.

Translation by Swami Sivananda

Hindi meaning

।।10.39।। हे अर्जुन ! जो समस्त भूतों की उत्पत्ति का बीज (कारण) है, वह भी में ही हूँ, क्योंकि ऐसा कोई चर और अचर भूत नहीं है, जो मुझसे रहित है।।  

Hindi rendering by Swami Tejomayananda

English meaning

I am the seed of all beings, O Arjuna! No creature, moving or unmoving, can live without Me.

Shri Purohit Swami

Further, O Arjuna, I am the seed of all beings; there is no being, whether moving or non-moving, that can exist without Me.

Dr. S. Sankaranarayan

Detailed explanation

I am the primeval seed from which all creation has come into existence. I am the seed of everything. I am the Self of everything. Nothing can exist without Me. Everything is of My nature. I am the essence of everything. Without Me all things would be mere void. I am the soul of everything.

Commentary by Swami Sivananda

Hindi commentary

।।10.39।। मैं समस्त भूतों का बीज हूँ स्थूल विषयों तथा सूक्ष्म भावनाओं और विचारों के अनुभूयमान जगत में आत्मा के स्वरूप? स्थान एवं कार्य को दर्शाने वाले उपर्युक्त वर्णनात्मक वाक्यों तथा उपमाओं के द्वारा निरन्तर यह सूचित किया गया है कि आत्मा ही सम्पूर्ण सृष्टि का स्रोत है। भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से? महर्षि व्यास? इस सारभूत सत्य को बारम्बार विविध प्रकारों से प्रतिपादित कराते हैं? जिससे कि गीता का कोई मन्दबुद्धि विद्यार्थी भी इसकी उपेक्षा न कर सके।साधकों को मननचिन्तन करने के लिए बीज और वृक्ष का दृष्टान्त एक अक्षय विषय है। भूमि में बीजारोपण करने के पश्चात् अनुकूल परिस्थितियों में बीज में स्थित अव्यक्त जीवन तत्त्व स्वत व्यक्त हो सकता है। वह अंकुरित बीज शीघ्र ही विकसित होकर कल्पनातीत ऊँचाई का वृक्ष बन जाता है? और तत्पश्चात् ऐसा प्रतीत हो सकता है? मानो उस वृक्ष का अपने कारणभूत बीज से कोई संबंध ही न हो। निरन्तर होने वाले परिवर्तन रूपी घन के प्रहारों से शोकाकुल हुए? केवल अनित्य जगत् को देखने वाले पुरुषों को ही सम्भवत? इस संसार में सृष्टि के कारणभूत दिव्य? अनन्त आनन्दस्वरूप सत्य का स्मरण कराने वाली कोई वस्तु ही दिखाई नहीं देती है।विश्व की बीजावस्था? बीज में वृक्ष की अव्यक्त अवस्था के तुल्य है। अनुकूल परिस्थितियों को पाकर बीज से अंकुर फूटकर ऊपर की ओर तने का रूप ले लेता है? और उसी प्रकार भूमि के अन्दर उसका मूल उतनी गहराई तक पहुँचता है। नाम और रूपमय यह सम्पूर्ण विश्व जब अपनी अव्यक्त अवस्था में होता है? तब वह उपनिषदों के अनुसार? प्रलय की स्थिति कहलाती है। यह समष्टि प्रलय का सिद्धांत व्यष्टि की दृष्टि से विचार करने पर बुद्धिगम्य हो जाता है। हमारी सुषुप्ति अवस्था में? हमारे व्यक्तिगत स्वभाव? चरित्र? क्षमता? शिक्षा? संस्कृति? सद्व्यवहार आदि सब अव्यक्त स्थिति में विद्यमान रहते हैं। संक्षेप में? निद्रावस्था में हमारे व्यक्तित्व की विशेषताएं बीजाव्ास्था में रहती हैं। विश्राम काल के अन्तराल के बाद? जब ये वासनाएं स्वयं को व्यक्त करने के लिए अधीर हो उठती हैं? तब यदि अनुकूल परिस्थितियां प्राप्त हो जायें? तो वे पूर्णरूप से व्यक्त होती हैं।इसी प्रकार? समष्टि मन की विश्राम की अवस्था में सम्पूर्ण जीवों की वासनाओं के साथ यह विश्व बीजावस्था में विद्यमान रहता है। यह एक अत्यन्त सुन्दर एवं तत्त्वबोधक उदाहरण हमारे प्राचीन ऋषियों ने दिया है। गर्भावस्था से? कालान्तर में अनुकूल परिस्थितियों में? यह अव्यक्त सृष्टि व्यक्त होती है और उसकी इस प्रथम अभिव्यक्ति को ऋषियों ने सुन्दर नाम दिया है हिरण्यगर्भ। इस अपूर्व और अद्भुत शब्द का पाश्चात्य विद्वानों ने गोल्डन एग अर्थात् स्वर्णअण्ड कहकर अनुवाद करके अनजाने ही हमारे धर्मशास्त्र की निन्दा की है और? इस प्रकार? उसके सौन्दर्य को भी कलुषित कर दिया है। वस्तुत? इस शब्द का अर्थ है? चराचर जगत् का गर्भ।यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण समष्टि कारण शरीर अर्थात् समस्त प्राणियों की वासनाओं के साथ तादात्म्य करके? सर्वज्ञ ईश्वर के रूप में कहते हैं कि वे वह महान् बीज हैं? जिससे यह संसार वृक्ष फलीभूत हुआ है तथा भविष्य में भी असंख्य बार ऐसा ही होता रहेगा।लौकिक अनुभव यह है कि बीज से वृक्ष की उत्पत्ति होने की प्रक्रिया में स्वत बीज का नाश हो जाता है। अत? भगवान् के कथन से गीता का कोई विद्यार्थी यह न समझ ले कि इस विश्व की उत्पत्ति में स्वयं भगवान् नष्ट हो जाते हैं इस प्रकार की विपरीत धारणा की निवृत्ति के लिए? श्रीकृष्ण कहते हैं? ऐसा कोई चर या अचर भूत नहीं है? जो मेरे बिना रहता है।परमात्मा का बीजत्व ऐसे ही है? जैसे समुद्र तरंगों का बीज है। तरंगों की उत्पत्ति और विकास समुद्र से भिन्न स्थान पर नहीं होते। जहाँ समुद्र नहीं? वहाँ तरंगों का भी अस्तित्व नहीं हो सकता। उसी प्रकार? असंख्य तरंगों की उत्पत्ति में स्वयं समुद्र कभी नष्ट नहीं होता।यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उस अविद्या से प्रकट होता है? जो मानों सत्य को आच्छादित कर देती है। इस अविद्या का अस्तित्व और उसकी भ्रमोत्पादक शक्ति ये दोनों ही प्रक्षेपित जगत् के स्रोतभूत ब्रह्म में ही स्थित होते हैं। यह आत्म अज्ञान ही सृष्टि का कारण है। चैतन्य आत्मा के बिना यह अविद्या और अविद्याजनित हमारे संसार के दुख प्रकाशित नहीं होते और हमें उनका भान तक नहीं होता।जैसे तरंगों का जनक? धारक और पोषक जल ही है? वैसे ही चैतन्य आत्मा इस संसार वृक्ष का जनक और पोषक है।यदि हमसे यह कहा जाता है कि कोई दस आभूषण स्वर्ण से बने हैं तथा स्वर्ण के बिना उनका अस्तित्व नहीं हो सकता है? तो स्पष्ट है कि वर्तमान में भी वे आभूषण स्वर्ण रूप ही हैं। इसी प्रकार? भगवान् यहाँ कहते हैं कि वे इस संसार बीज के वृक्ष हैं इस आंशिक कथन में वे इस बात को भी जोड़ते हैं कि मेरे बिना कोई भूतवस्तु नहीं रह सकती। इसलिए यह विश्व भगवत्स्वरूप ही है।अब तक किये गये सम्पूर्ण विवेचन का उपसंहार? भगवान् अगले तीन श्लोकों में करते हैं

Swami Chinmayananda

।।10.39।। व्याख्या--'यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदमहर्जुन'--यहाँ भगवान् समस्त विभूतियोंका सार बताते हैं कि सबका बीज अर्थात् कारण मैं ही हूँ। बीज कहनेका तात्पर्य है कि इस संसारका निमित्त कारण भी मैं हूँ और उपादान कारण भी मैं हूँ अर्थात् संसारको बनानेवाला भी मैं हूँ और संसाररूपसे बननेवाला भी मैं हूँ।भगवान्ने सातवें अध्यायके दसवें श्लोकमें अपनेको 'सनातन बीज', नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें 'अव्यय बीज' और यहाँ केवल 'बीज' बताया है। इसका तात्पर्य है कि मैं ज्योंकात्यों रहता हुआ ही संसाररूपसे प्रकट हो जाता हूँ और संसाररूपसे प्रकट होनेपर भी मैं उसमें ज्यों-का-त्यों व्यापक रहता हूँ।

Swami Ramsukhdas

Key teachings

  • I am the primeval seed from which all creation has come into existence.
  • Without Me all things would be mere void.

Spiritual significance

In Vibhooti Yoga (Yoga through Appreciating the Infinite Opulences of God), this verse belongs to the Gita’s teaching on bhakti yoga. Here the text presents that teaching through these words: And whatever is the seed of all beings, that too am I, O Arjuna; there is no being, be it moving or unmoving, that can exist without Me.

This verse sits inside Chapter 10: Vibhooti Yoga, part of the Gita’s Bhakti Yoga section.

Questions about this verse

What is Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 39 about?

Chapter 10, verse 39 is part of Vibhooti Yoga. In the English translation used on this page, it says: And whatever is the seed of all beings, that too am I, O Arjuna; there is no being, be it moving or unmoving, that can exist without Me.

What is the spiritual context of this verse?

It appears in Vibhooti Yoga, a chapter associated with Bhakti Yoga. God as the source of excellence.