That same ancient yoga has been today taught to you by me, for you are my devotee and my friend; it is the supreme secret.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।4.3।। वह ही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा (सिखाया) क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह उत्तम रहस्य है।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
It is the same ancient path that I have now revealed to you, for you are my devotee and my friend. It is the supreme secret.
Shri Purohit Swami
The same ancient Yoga has now been taught to you by Me, on the grounds that you are both My devotee and friend. This is the highest secret.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
This Yoga contains profound and subtle teachings. Hence it is the supreme secret which is revealed by the Lord.
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।4.3।। यहाँ भगवान् अब तक के उपदिष्ट ज्ञान के प्राचीनता की घोषणा करके रूढ़िवादी विचारकों की शंका का निर्मूलन कर देते हैं।शिष्य के प्रति स्नेह भाव होने पर ही कोई गुरु उत्साह और कुशलता पूर्वक उपदेश दे सकता है। श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच ऐसा ही सम्बन्ध था और भगवान् को यह विश्वास था कि उनके द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का वह अनुसरण करेगा। गुरु और शिष्य के बीच इस प्रकार की व्यापारिक व्यवस्था न हो कि तुम शुल्क दो और मैं पढ़ाऊँगा। प्रेम और स्वातन्त्र्य मित्रता और आपसी समझ के वातावरण में ही मन और बुद्धि विकसित होकर खिल उठते हैं। आत्मानुभव का ज्ञान प्रदान करने के लिए आवश्यक गुणों को अर्जुन में देखकर ही श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने इस योग का ज्ञान उसे दिया।यहाँ इस ज्ञान को रहस्य कहने का तात्पर्य केवल इतना ही है कि कोई व्यक्ति कितना ही बुद्धिमान् क्यों न हो फिर भी अनुभवी पुरुष के उपदेश के बिना वह आत्मा के अस्तित्व का कभी आभास भी नहीं पा सकता। समस्त बुद्धि वृत्तियों को प्रकाशित करने वाली आत्मा स्वयं बुद्धि के परे होती है। इसलिये मनुष्य की विवेक सार्मथ्य कभी भी नित्य अविकारी आत्मा को विषय रूप में नहीं जान सकती। यही कारण है कि सत्य के विज्ञान को यहाँ उत्तम रहस्य कहा गया है।किसी के मन में यह शंका न रह जाये कि भगवान् के वाक्यों में परस्पर विरोध है इसलिये अर्जुन मानो आक्षेप करता हुआ प्रश्न पूछता है
Swami Chinmayananda
4.3।। व्याख्या-- 'भक्तोऽसि मे सखा चेति' अर्जुन भगवान्को अपना प्रिय सखा पहलेसे ही मानते थे (गीता 11। 41 42), पर भक्त अभी (गीता 2। 7 में) हुए हैं अर्थात् अर्जुन सखा भक्त तो पुराने हैं, पर दास्य भक्त नये हैं। आदेश या उपदेश दास अथवा शिष्यको ही दिया जाता है, सखाको नहीं। अर्जुन जब भगवान्के शरण हुए, तभी भगवान्का उपदेश आरम्भ हुआ।जो बात सखासे भी नहीं कही जाती, वह बात भी शरणागत शिष्यके सामने प्रकट कर दी जाती है। अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि 'मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए, मुझको शिक्षा दीजिये।' इसलिये भगवान् अर्जुनके सामने अपनेआपको प्रकट कर देते हैं, रहस्यको खोल देते हैं।
अर्जुनका भगवान्के प्रति बहुत विशेष भाव था, तभी तो उन्होंने वैभव और अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित 'नारायणी सेना' का त्याग करके निःशस्त्र भगवान्को अपने 'सारथि' के रूपमें स्वीकार किया (टिप्पणी प0 211)।साधारण लोग भगवान्की दी हुई वस्तुओंको तो अपनी मानते हैं (जो अपनी हैं ही नहीं), पर भगवान्को अपना नहीं मानते (जो वास्तवमें अपने हैं)। वे लोग वैभवशाली भगवान्को न देखकर उनके वैभवको ही देखते हैं। वैभवको ही सच्चा माननेसे उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि वे भगवान्का अभाव ही मान लेते हैं अर्थात् भगवान्की तरफ उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। कुछ लोग वैभवकी प्राप्तिके लिये ही भगवान्का भजन करते हैं। भगवान्को चाहनेसे तो वैभव भी पीछे आ जाता है, पर वैभवको चाहनेसे भगवान् नहीं आ सकते। वैभव तो भक्तके चरणोंमें लोटता है; परन्तु सच्चे भक्त वैभवकी प्राप्तिके लिये भगवान्का भजन नहीं करते। वे वैभवको नहीं चाहते, अपितु भगवान्को ही चाहते हैं। वैभवको चाहनेवाले मनुष्य वैभवके भक्त (दास) होते हैं और भगवान्को चाहनेवाले मनुष्य भगवान्के भक्त होते हैं। अर्जुनने वैभव-(नारायणी सेना-) का त्याग करके केवल भगवान्को अपनाया, तो युद्धक्षेत्रमें भीष्म, द्रोण, युधिष्ठिर आदि महापुरुषोंके रहते हुए भी गीताका महान् दिव्य उपदेश केवल अर्जुनको ही प्राप्त हुआ और बादमें राज्य भी अर्जुनको मिल गया!
Swami Ramsukhdas
Key teachings
This Yoga contains profound and subtle teachings.
Hence it is the supreme secret which is revealed by the Lord.
Spiritual significance
In Jnana Karma Sanyasa Yoga (Path of Knowledge and the Disciplines of Action), this verse belongs to the Gita’s teaching on karma yoga. Here the text presents that teaching through these words: That same ancient yoga has been today taught to you by me, for you are my devotee and my friend; it is the supreme secret.
Chapter 4, verse 3 is part of Jnana Karma Sanyasa Yoga. In the English translation used on this page, it says: That same ancient yoga has been today taught to you by me, for you are my devotee and my friend; it is the supreme secret.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Jnana Karma Sanyasa Yoga, a chapter associated with Karma Yoga. Divine descent.