ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।।14.27।।
Transliteration
brahmaṇo hi pratiṣhṭhāham amṛitasyāvyayasya cha
śhāśhvatasya cha dharmasya sukhasyaikāntikasya cha
Word meanings
brahmaṇaḥ—of Brahman; hi—only; pratiṣhṭhā—the basis; aham—I; amṛitasya—of the immortal; avyayasya—of the imperishable; cha—and; śhāśhvatasya—of the eternal; cha—and; dharmasya—of the dharma; sukhasya—of bliss; aikāntikasya—unending; cha—and
English translation
For I am the abode of Brahman, the immortal, immutable, and everlasting Dharma, and absolute bliss.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।14.27।। क्योंकि मैं अमृत, अव्यय, ब्रह्म, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक अर्थात् पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा हूँ।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
For I am the home of the spirit, the continual source of immortality, eternal righteousness, and infinite joy.
Shri Purohit Swami
'I' am the support for the immortal and changeless Brahman and for its eternal attribute, the unalloyed happiness.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
The Self Which is immortal and immutable, Which is attainable by the eternal Dharma or the knowledge of the Self, Which is unending bliss, abides in Me, the Supreme Being.,I, the innermost Self, am the abode of the Supreme Self. The aspirant beholds, with the eye of intuition, that the innermost Self is the very Supreme Self, through Selfrealisation.The Lord bestows grace and mercy on His devotees through His Sakti, energy or power, or Maya. Sakti and the Lord are one. Just as heat is inseparable from fire, so also Maya or Sakti is inseparable from the Lord. Sakti cannot be distinct from the Lord in Whom She inheres.There is another interpretation. By Brahman here is meant the Brahman with attributes or alities, the conditioned Brahman. I, the Absolute Brahman, transcending the attributes or alities, the unconditioned Absolute, am the abode of the Saguna (conditioned) Brahman Who is immortal and imperishable. I am also the abode of the eternal Dharma of Jnananishtha (establishment in the highest wisdom) and the abode of the unending bliss born of that unswerving devotion.Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita, the science of the Eternal, the scripture of Yoga, the dialogue between Sri Krishna and Arjuna, ends the fourteenth discourse entitledThe Yoga of the Division of the Three Gunas.,
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।14.27।। भक्तियोग तथा उसके परम लक्ष्य का वर्णन करते हुये भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा था? तत्पश्चात्? तुम मुझमें ही निवास करोगे। ईश्वर के प्रति अपने प्रेम से प्रेरणा पाकर भक्त अपने भिन्न व्यक्तित्व को विस्मृत करके अपने ध्येय परमात्मा के साथ लीन हो जाता है। पूर्व के श्लोक में भगवान् ने कहा था कि अव्यभिचारी भक्तियोग से उनकी सेवा करने वाला साधक अनात्म उपाधियों के साथ के अपने तादात्म्य से शनै शनै मुक्त हो जाता है। जिस मात्रा में अहंकार समाप्त होता है? उसी मात्रा में आत्मा की दिव्यता की अभिव्यक्ति होती है। जैसेजैसे निद्रा का आवेश बढ़ता जाता है वैसेवैसे मनुष्य जाग्रत अवस्था से दूर होता हुआ निद्रा की शान्त स्थिति में लीन हाेता जाता है। अनुभव के एक स्तर को त्यागने का अर्थ ही दूसरे अनुभव में प्रवेश करना है।मैं ब्रह्म की प्रतिष्ठा हूँ जो चैतन्य साधक के हृदय में आत्माभाव से स्थित है? वही सर्वत्र समान रूप से व्याप्त अमृत? अव्यय? नित्य? आनन्दस्वरूप तत्त्व ब्रह्म है। आत्मा की पहिचान ही विश्वाधिष्ठान अनन्त ब्रह्म की अनुभूति है। घट उपाधि की दृष्टि से उससे अवच्छिन्न आकाश (घटाकाश) बाह्य सर्वव्यापी आकाश से भिन्न प्रतीत होता है? परन्तु उपाधि के अभाव में वह घटाकाश ही महाकाश बन जाता है। इसी प्रकार एक देह की उपाधि से चैतन्य तत्त्व को आत्मा कहते हैं? किन्तु वस्तुत वही अनन्त ब्रह्म है। यह ब्रह्म अमृत और अव्यय? नित्य और आनन्दस्वरूप है।श्री शंकाराचार्य अपने अत्यन्त युक्तियुक्त एवं विश्लेषणात्मक भाष्य में इस श्लोक की व्याख्या में चार पर्यायों की ओर संकेत करते हैं। ये अर्थ परस्पर भिन्न नहीं? वरन् प्रत्येक अर्थ इस श्लोक के दार्शनिक पक्ष को अधिकाधिक उजागर करता है। वे कहते हैं प्रतिष्ठा का अर्थ है जिसमें वस्तु की स्थिति होती है? क्योंकि अमृत और अव्यय ब्रह्म की प्रतिष्ठा मैं हूँ? अत मैं प्रत्यगात्मा हूँ। यह प्रत्यागात्मा ही परमात्मा अर्थात् भूत मात्र की आत्मा है? ऐसा सम्यक् ज्ञान से निश्चित किया गया है।जिस शक्ति से ब्रह्म अपने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये प्रवृत्त होता है? वह शक्ति ब्रह्म ही है? जो मैं हूँ। यहाँ शक्ति शब्द से शक्तिमान ईश्वर लक्षित है। इसका अभिप्राय यह है कि निर्गुण ब्रह्म ही माया शक्ति के द्वारा ईश्वर के रूप में भक्तों पर अनुग्रह करता है।अथवा? ब्रह्म शब्द से सगुण? सोपाधिक ब्रह्म कहा गया है? जिसकी प्रतिष्ठा निरुपाधिक ब्रह्म मैं ही हूँ। जैसा कि पहले कहा गया है? इन अर्थों में परस्पर भेद नहीं है। हमारी बुद्धि की सीमित क्षमता के द्वारा सोपाधिक ब्रह्म को ही समझा जा सकता है तथा वाणी के द्वारा प्रकृति से भिन्न रूप में उसका वर्णन किया जा सकता है।प्रकृति और सोपाधिक ब्रह्म की प्रतिष्ठा निरुपाधिक चैतन्य ब्रह्म है? जो इन दोनों को ही प्रकाशित करता है। अत वस्तुत निर्विकल्प? अमृत? अव्यय? अनिर्वचनीय आनन्दस्वरूप ब्रह्म मैं हूँ। अब यह स्पष्ट हो जाता है कि साधन सपन्न उत्तम अधिकारी भगवान् श्रीकृष्ण के कथनानुसार मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है? और मैं ब्रह्म हूँ? इसलिये वह साधक ब्रह्म ही बन जाता है।अगले अध्याय में ब्रह्म के विषय में और अधिक विस्तृत निरूपण किया गया है।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे।श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय।।
Swami Chinmayananda
।।14.27।। व्याख्या -- ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम् -- मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा? आश्रय हूँ -- ऐसा कहनेका तात्पर्य ब्रह्मसे अपनी अभिन्नता बतानेमें है। जैसे जलती हुई अग्नि साकार है और काष्ठ आदिमें रहनेवाली अग्नि निराकार है -- ये अग्निके दो रूप हैं? पर तत्त्वतः अग्नि एक ही है। ऐसे ही भगवान् साकाररूपसे हैं और ब्रह्म निराकररूपसे है -- ये दो रूप साधकोंकी उपासनाकी दृष्टिसे हैं? पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं? दो नहीं। जैसे भोजनमें एक सुगन्ध होती है और एक स्वाद होता है नासिकाकी दृष्टिसे सुगन्ध होती है और रसनाकी दृष्टिसे स्वाद होता है? पर भोजन तो एक ही है। ऐसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे ब्रह्म है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान् हैं? पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं।भगवान् कृष्ण अलग हैं और ब्रह्म अलग है -- यह भेद नहीं है किन्तु भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म हैं और ब्रह्म ही भगवान् कृष्ण है। गीतामें भगवान्ने अपने लिये ब्रह्म शब्दका भी प्रयोग किया है -- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि (5। 10) और अपनेको अव्यक्तमूर्ति भी कहा है -- मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना (9। 4)। तात्पर्य है कि साकार और निराकार एक ही हैं? दो नहीं।अमृतस्याव्ययस्य च -- अविनाशी अमृतका अधिष्ठान मैं ही हूँ और मेरा ही अधिष्ठान अविनाशी अमृत है। तात्पर्य है कि अविनाशी अमृत और मैं -- ये दो तत्त्व नहीं हैं? प्रत्युत एक ही हैं। इसी अविनाशी अमृतकी प्राप्तिको भगवान्ने अमृतमश्नुते (13। 12 14। 20) पदसे कहा है।शाश्वतस्य च धर्मस्य -- सनातन धर्मका आधार मैं हूँ और मेरा आधार सनातन धर्म है। तात्पर्य है कि सनातन धर्म और मैं -- ये दो नहीं हैं? प्रत्युत एक ही हैं। सनातन धर्म मेरा ही स्वरूप है (टिप्पणी प0 738)। गीतामें अर्जुनने भगवान्को शाश्वतधर्मका गोप्ता (रक्षक) बताया है (11। 18)। भगवान् भी अवतार लेकर सनातन धर्मकी रक्षा किया करते हैं (4। 8)।सुखस्यैकान्तिकस्य च -- ऐकान्तिक सुखका आधार मैं हूँ और मेरा आधार ऐकान्तिक सुख है अर्थात् मेरा ही स्वरूप ऐकान्तिक सुख है। भगवान्ने इसी ऐकान्तिक सुखको अक्षय सुख (5। 21)? आत्यन्तिक सुख (6। 21) और अत्यन्त सुख (6। 28) नामसे कहा है।इस श्लोकमें ब्रह्मणः? अमृतस्य आदि पदोंमें राहोः शिरः की तरह अभिन्नतामें षष्ठी विभक्तिका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि राहुका सिर -- ऐसा जो प्रयोग होता है? उसमें राहु अलग है और सिर अलग है -- ऐसी बात नहीं है? प्रत्युत राहुका नाम ही सिर है और सिरका नाम ही राहु है। ऐसे ही यहाँ ब्रह्म? अविनाशी अमृत आदि ही भगवान् कृष्ण हैं और भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म? अविनाशी अमृत आदि हैं।ब्रह्म कहो? चाहे कृष्ण कहो? और कृष्ण कहो? चाहे ब्रह्म कहो अविनाशी अमृत कहो? चाहे कृष्ण कहो? और कृष्ण कहो चाहे अविनाशी अमृत कहो शाश्वत धर्म कहो? चाहे कृष्ण कहो और कृष्ण कहो चाहे शाश्वत धर्म कहो ऐकान्तिक सुख कहो चाहे कृष्ण कहो और कृष्ण कहो चाहे ऐकान्तिक सुख कहो एक ही बात है। इसमें कोई आधारआधेय भाव नहीं है? एक ही तत्त्व है। इसलिये भगवान्की उपासना करनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है -- यह बात ठीक ही है।इस प्रकार ? तत्? सत् -- इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें गुणत्रयविभागयोग नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।14।।,
Swami Ramsukhdas
Key teachings
The Self Which is immortal and immutable, Which is attainable by the eternal Dharma or the knowledge of the Self, Which is unending bliss, abides in Me, the Supreme Being.,I, the innermost Self, am the abode of the Supreme Self.
The aspirant beholds, with the eye of intuition, that the innermost Self is the very Supreme Self, through Selfrealisation.The Lord bestows grace and mercy on His devotees through His Sakti, energy or power, or Maya.
Just as heat is inseparable from fire, so also Maya or Sakti is inseparable from the Lord.
Spiritual significance
In Gunatraya Vibhaga Yoga (Yoga through Understanding the Three Modes of Material Nature), this verse belongs to the Gita’s teaching on jnana yoga. Here the text presents that teaching through these words: For I am the abode of Brahman, the immortal, immutable, and everlasting Dharma, and absolute bliss.
The aspirant beholds, with the eye of intuition, that the innermost Self is the very Supreme Self, through Selfrealisation.The Lord bestows grace and mercy on His devotees through His Sakti, energy or power, or Maya.
Chapter 14, verse 27 is part of Gunatraya Vibhaga Yoga. In the English translation used on this page, it says: For I am the abode of Brahman, the immortal, immutable, and everlasting Dharma, and absolute bliss.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Gunatraya Vibhaga Yoga, a chapter associated with Jnana Yoga. Sattva, rajas, and tamas.