dyūtam—gambling; chhalayatām—of all cheats; asmi—I am; tejaḥ—the splendor; tejasvinām—of the splendid; aham—I; jayaḥ—victory; asmi—I am; vyavasāyaḥ—firm resolve; asmi—I am; sattvam—virtue; sattva-vatām—of the virtuous; aham—I
English translation
I am the gambling of the deceitful; I am the splendor of the splendid; I am victory; I am the resolve of the resolute; I am the goodness of the good.
Translation by Swami Sivananda
Hindi meaning
।।10.36।। मैं छल करने वालों में द्यूत हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ, मैं विजय हूँ; मैं व्यवसाय (उद्यमशीलता) हूँ और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।।
Hindi rendering by Swami Tejomayananda
English meaning
I am the gambler's cheat and the splendor of the splendid; I am victory; I am effort; and I am the purity of the pure.
Shri Purohit Swami
I am the destroyer of the fraudulent; I am the brilliance of the brilliant; I am the victory; I am the determination; I am the strength of the strong.
Dr. S. Sankaranarayan
Detailed explanation
Of the methods of defrauding others I am gambling such as diceplay. Gambling is My manifestation. I am the power of the powerful. I am the victoyr of the victorious. I am the effort of those who make that effort.I am Sattva which assumes the forms of Dharma (virtue), Jnana (knowledge), Vairagya (dispassion), and Aisvarya (wealth or lordship) in Sattvic persons.
Commentary by Swami Sivananda
Hindi commentary
।।10.36।। मैं द्यूत हूँ गीता का उपदेश अपने समय के एक क्षत्रिय राजा योद्धा अर्जुन को दिया गया था। इसका उपदेश भगवान् श्रीकृष्ण ने? धर्मप्रचारक के महान् उत्साह के साथ? अर्जुन को उसके अपने ही धर्म का बोध कराने के लिए किया था इसलिए गीता का प्रयत्न हिन्दुओं को ही हिन्दू बनाने का है? उन्हें स्वधर्म का पुनर्बोध कराने का है। यह पुनर्बोध का कार्य तब तक सफलतापूर्वक नहीं किया जा सकता जब तक हमारे धर्मशास्त्रों का मर्म सामान्य जनता को उसकी ही भाषा में समझाया नहीं जाता। यहाँ दिया हुआ उदाहरण अर्जुन को तत्क्षण ही समझ में आने जैसा है। कारण यह है कि उसका सम्पूर्ण जीवन दुखों की एक शृंखला थी? जिसे उसे सहन करना पड़ा था? केवल अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की द्यूत खेलने के व्यसन के कारण। कोई अन्य दृष्टान्त अर्जुन के लिए इतना सुबोध नहीं हो सकता था।आधुनिक पीढ़ी को सम्भवत यह उदाहरण इतना अधिक सुबोध न प्रतीत होता हो? क्योंकि अब द्यूत का खेल अधिक लोकप्रिय नहीं रहा है। किन्तु उसके स्थान पर अन्य उदाहरण सरलता से पहचाने जा सकते हैं।मैं तेजस्वियों का तेज हूँ विभूति के इस दृष्टान्त का उपयोग जो साधक ध्यानाभ्यास के लिए करना चाहेगा? उसे ज्ञात होगा कि यहाँ शास्त्र ने कुछ कहा ही नहीं है। तेजस्वी वस्तुओं का जो तेज है? उसमें उस वस्तु के गुण नहीं होते हैं। उस तेज में अपने स्वयं के गुण भी नहीं होते तेज केवल एक अनुभव है। इस अनुभव को सहज सुगम बनाने के लिए? मन उस वस्तु के परिमाण और वैभव को प्रकाशित करता है? परन्तु अनुभूति तेज में उस वस्तु के उपादान भूत पदार्थ के कुछ भी गुण नहीं होते। संक्षेप में जैसा कि श्रीरामकृष्ण परमहंस ने एक बार कहा था निसन्देह सत्य एक प्रकाश है? परन्तु वह गुणरहित प्रकाश है।मैं विजय हूँ उद्यमशीलता हूँ और मैं साधुओं की साधुता हूँ जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है? यहाँ भी ये गुण मन की उस स्थिति या दशा को बताते हैं? जो इस प्रकार के निरन्तर चिन्तन से निर्मित होती है। जब उद्यमशीलता और साधुता जैसे गुणों को बनाये रखा जाता है? तब मन अत्यन्त शान्त और स्थिर हो जाता है जिसमें चैतन्य आत्मा का प्रतिबिम्वित वैभव इतना स्पष्टऔर तेजस्वी होता है कि मानो वही स्वयं सत्य है। अत पूर्वकथित गुणों की प्रत्यारोपण की भाषा में भगवान् कहते हैं कि ये गुण ही मैं हूँ? जबकि वस्तुत ये अन्तकरण के धर्म हैं।हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ अनेकता में एक परमात्मा की विद्यमानता दर्शाने के लिए जो 54 उदाहरण दिये गये हैं? वे सब एक निष्ठावान साधक को ध्यान के लिए बताये हुए अभ्यास हैं। यह कोई दृश्य पदार्थ का वर्णन नहीं समझना चाहिए। इन श्लोकों के तात्पर्यार्थ को जब तक साधक अपने निज के अनुभव से नहीं समझता? तब तक उसकी शिक्षा पूर्ण नहीं कही जा सकती।भगवान् और भी दृष्टान्त देते हुए कहते हैं
Swami Chinmayananda
।।10.36।। व्याख्या--'द्यूतं छलयतामस्मि'--छल करके दूसरोंके राज्य, वैभव, धन, सम्पत्ति आदिका (सर्वस्वका) अपहरण करनेकी विशेष सामर्थ्य रखनेवाली जो विद्या है, उसको जूआ कहते हैं। इस जूएको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
शङ्का--यहाँ भगवान्ने छल करनेवालोंमें जूएको अपनी विभूति बताया है तो फिर इसके खेलनमें क्या दोष है? अगर दोष नहीं है तो फिर शास्त्रोंने इसका निषेध क्यों किया है।
समाधान --'ऐसा करो और ऐसा मत करो'-- यह शास्त्रोंका विधि-निषेध कहलाता है। ऐसे विधि-निषेधका वर्णन यहाँ नहीं है। यहाँ तो विभूतियोंका वर्णन है। मैं आपका चिन्तन कहाँ-कहाँ करूँ?' -- अर्जुनके इस प्रश्नके अनुसार भगवान्ने विभूतियोंके रूपमें अपने चिन्तनकी बात ही बतायी है अर्थात् भगवान्का चिन्तन सुगमतासे हो जाय, इसका उपाय विभूतियोंके रूपमें बताया है। अतः जिस समुदायमें मनुष्य रहता है, उस समुदायमें जहाँ दृष्टि पड़े, वहाँ संसारको न देखकर भगवान्को ही देखे; क्योंकि भगवान् कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् मेरेसे व्याप्त है अर्थात् इस जगत्में मैं ही व्याप्त हूँ, परिपूर्ण हूँ (गीता 9। 4)।
Swami Ramsukhdas
Key teachings
Of the methods of defrauding others I am gambling such as diceplay.
I am the effort of those who make that effort.I am Sattva which assumes the forms of Dharma (virtue), Jnana (knowledge), Vairagya (dispassion), and Aisvarya (wealth or lordship) in Sattvic persons.
Spiritual significance
In Vibhooti Yoga (Yoga through Appreciating the Infinite Opulences of God), this verse belongs to the Gita’s teaching on bhakti yoga. Here the text presents that teaching through these words: I am the gambling of the deceitful; I am the splendor of the splendid; I am victory; I am the resolve of the resolute; I am the goodness of the good.
Chapter 10, verse 36 is part of Vibhooti Yoga. In the English translation used on this page, it says: I am the gambling of the deceitful; I am the splendor of the splendid; I am victory; I am the resolve of the resolute; I am the goodness of the good.
What is the spiritual context of this verse?
It appears in Vibhooti Yoga, a chapter associated with Bhakti Yoga. God as the source of excellence.