Bhagavad Gita Chapter 1: Arjuna Visada Yoga

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 7

|| श्रीमद्भगवद्‌ गीता  1.7 ||

Chapter 1 · Arjuna Visada Yoga · Karma Yoga

Sanskrit verse

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम। नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते।।1.7।।

Transliteration

asmākaṁ tu viśhiṣhṭā ye tānnibodha dwijottama nāyakā mama sainyasya sanjñārthaṁ tānbravīmi te

Word meanings

asmākam—ours; tu—but; viśhiṣhṭāḥ—special; ye—who; tān—them; nibodha—be informed; dwija-uttama—best of Brahmnis; nāyakāḥ—principal generals; mama—our; sainyasya—of army; sanjñā-artham—for information; tān—them; bravīmi—I recount; te—unto you

English translation

"Know also, O best among the twice-born! the names of those who are the most distinguished amongst ourselves, the leaders of my army; these I name to you for your information.

Translation by Swami Sivananda

Hindi meaning

।।1.7।।हे द्विजोत्तम ! हमारे पक्ष में भी जो विशिष्ट योद्धागण हैं , उनको आप जान लीजिये; आपकी जानकारी के लिये अपनी सेना के नायकों के नाम मैं आपको बताता हूँ।  

Hindi rendering by Swami Tejomayananda

English meaning

No changes needed.

Shri Purohit Swami

O best among the twice-born! Please take note of the most distinguished amongst us, who are the generals of my army and who are accepted as leaders by the heroes in my mighty army; I shall name them to you.

Dr. S. Sankaranarayan

Detailed explanation

1.7 अस्माकम् ours, तु also, विशिष्टाः the best, ये who (those), तान् those, निबोध know (thou), द्विजोत्तम (O) best among the twicorn ones, नायकाः the leaders, मम my, सैन्यस्य of the army, संज्ञार्थम् for information, तान् them, ब्रवीमि speak, ते to thee.No Commentary.

Commentary by Swami Sivananda

Hindi commentary

।।1.7।। द्रोणाचार्य को द्विजोत्तम कहकर सम्बोधित करते हुये दुर्योधन अपनी सेना के प्रमुख वीर योद्धाओं के नाम सुनाता है। एक कायर मनुष्य अंधेरे में अनुभव होने वाले भय को दूर करने के लिये सीटी बजाता है अथवा कुछ गुनगुनाने लगता है। दुर्योधन की स्थिति भी कुछ इसी प्रकार की थी। अपराधबोध से पीड़ित अत्याचारी दुर्योधन की मनस्थिति बिखर रही थी। यद्यपि उसकी सेना सक्षम शूरवीरों से सुसज्जित थी तथापि शत्रुपक्ष के वीरों को देखकर उसे भय लग रहा था। अत द्रोणाचार्य के मुख से स्वयं को प्रोत्साहित करने वाले शब्दों को वह सुनना चाहता था। परन्तु जब वह आचार्य के पास पहुँचा तब वे शान्त और मौन रहे। इसलिये टूटत्ो उत्साह को फिर से जुटाने के लिये वह अपनी सेना के प्रमुख योद्धाओं के नाम गिनाने लगता है।यह स्वाभाविक है कि अपराधबोध के भार से दबा हुआ व्यक्ति नैतिक बल के अभाव में सम्भाषणादि की मर्यादा को भूलकर अत्यधिक बोलने लगता है। ऐसे मानसिक तनाव के समय व्यक्ति के वास्तविक संस्कार उजागर होते हैं। यहाँ दुर्योधन अपने गुरु को द्विजोत्तम कहकर सम्बोधित करता है। आन्तरिक ज्ञान के विकास के कारण ब्राह्मण को द्विज (दो बार जन्मा हुआ) कहा जाता है। माता के गर्भ से जन्म लेने पर मनुष्य संस्कारहीन होने के कारण पशुतुल्य ही होता है। संस्कार एवं अध्ययन के द्वारा वह एक शिक्षित व सुसंस्कृत पुरुष बनता है। यह उसका दूसरा जन्म माना जाता है। यह द्विज शब्द का अर्थ है। द्रोणाचार्य ब्राह्मण कुल में जन्में थे और स्वभावत उनमें हृदय की कोमलता आदि श्रेष्ठ गुण थे। पाण्डव सैन्य में उनके प्रिय शिष्य ही उपस्थित थे। यह सब जानकर चतुर किन्तु निर्लज्ज दुर्योधन को अपने गुरु की निष्पक्षता पर भी संदेह होने लगा था। जब हमारे उद्देश्य पापपूर्ण और कुटिलता से भरे होते हैं तब हम अपने समीपस्थ और अधीनस्थ लोगों में भी उन्हीं अवगुणों की कल्पना करने लगते हैं।

Swami Chinmayananda

।।1.7।। व्याख्या-- 'अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम'-- दुर्योधन द्रोणाचार्यसे कहता है कि हे द्विजश्रेष्ठ! जैसे पाण्डवोंकी सेनामें श्रेष्ठ महारथी हैं, ऐसे ही हमारी सेनामें भी उनसे कम विशेषतावाले महारथी नहीं हैं प्रत्युत उनकी सेनाके महारथियोंकी अपेक्षा ज्यादा ही विशेषता रखनेवाले हैं। उनको भी आप समझ लीजिये। तीसरे श्लोकमें 'पश्य' और यहाँ  'निबोध'  क्रिया देनेका तात्पर्य है कि पाण्डवोंकी सेना तो सामने खड़ी है, इसलिये उसको देखनेके लिये दुर्योधन  'पश्य'  (देखिये) क्रियाका प्रयोग करता है। परन्तु अपनी सेना सामने नहीं है अर्थात् अपनी सेनाकी तरफ द्रोणाचार्यकी पीठ है, इसलिये उसको देखनेकी बात न कहकर उसपर ध्यान देनेके लिये दुर्योधन 'निबोध' (ध्यान दीजिये) क्रियाका प्रयोग करता है।  'नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते'-- मेरी सेनामें भी जो विशिष्टविशिष्ट सेनापति हैं सेनानायक हैं महारथी हैं, मैं उनके नाम केवल आपको याद दिलानेके लिये, आपकी दृष्टि उधर खींचनेके लिये ही कह रहा हूँ।  संज्ञार्थम् पदका तात्पर्य है कि हमारे बहुत-से सेनानायक हैं उनके नाम मैं कहाँतक कहूँ; इसलिये मैं उनका केवल संकेतमात्र करता हूँ; क्योंकि आप तो सबको जानते ही हैं। इस श्लोकमें दुर्योधनका ऐसा भाव प्रतीत होता है कि हमारा पक्ष किसी भी तरह कमजोर नहीं है। परन्तु राजनीतिके अनुसार शत्रुपक्ष चाहे कितना ही कमजोर हो और अपना पक्ष चाहे कितना ही सबल हो, ऐसी अवस्थामें भी शत्रुपक्षको कमजोर नहीं समझना चाहिये और अपनेमें उपेक्षा, उदासीनता आदिकी भावना किञ्चिन्मात्र भी नहीं आने देनी चाहिये। इसलिये सावधानीके लिये मैंने उनकी सेनाकी बात कही और अब अपनी सेनाकी बात कहता हूँ। दूसरा भाव यह है कि पाण्डवोंकी सेनाको देखकर दुर्योधनपर बड़ा प्रभाव पड़ा और उसके मनमें कुछ भय भी हुआ। कारण कि संख्यामें कम होते हुए भी पाण्डव-सेनाके पक्षमें बहुत-से धर्मात्मा पुरुष थे और स्वयं भगवान् थे। जिस पक्षमें धर्म और भगवान् रहते हैं, उसका सबपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। पापी-से-पापी, दुष्ट-से-दुष्ट व्यक्तिपर भी उसका प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं, पशु-पक्षी वृक्ष-लता आदिपर भी उसका प्रभाव पड़ता है। कारण कि धर्म और भगवान् नित्य हैं। कितनी ही ऊँची-से-ऊँची भौतिक शक्तियाँ क्यों न हों, हैं वे सभी अनित्य ही। इसलिये दुर्योधनपर पाण्डव-सेनाका बड़ा असर पड़ा। परन्तु उसके भीतर भौतिक बलका विश्वास मुख्य होनेसे वह द्रोणाचार्यको विश्वास दिलानेके लिये कहता है कि हमारे पक्षमें जितनी विशेषता है, उतनी पाण्डवोंकी सेनामें नहीं है। अतः हम उनपर सहज ही विजय कर सकते हैं।

Swami Ramsukhdas

Spiritual significance

In Arjuna Visada Yoga (Arjuna's Dilemma), this verse belongs to the Gita’s teaching on karma yoga. Here the text presents that teaching through these words: "Know also, O best among the twice-born! the names of those who are the most distinguished amongst ourselves, the leaders of my army; these I name to you for your information.

This verse sits inside Chapter 1: Arjuna Visada Yoga, part of the Gita’s Karma Yoga section.

Questions about this verse

What is Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 7 about?

Chapter 1, verse 7 is part of Arjuna Visada Yoga. In the English translation used on this page, it says: "Know also, O best among the twice-born! the names of those who are the most distinguished amongst ourselves, the leaders of my army; these I name to you for your information.

What is the spiritual context of this verse?

It appears in Arjuna Visada Yoga, a chapter associated with Karma Yoga. Duty on the battlefield.